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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

यत ॥ २ ॥ तद्व्यक्षरंत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥

उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ दक्षिण ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका शुक्ल रूप है वह वही है ॥ २-३ ॥

| तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपन्नित्येवमादि सर्वं समानम् । मध्वेतदादित्यस्य दृश्यते शुक्लं रूपम् ॥ २-३ ॥ | उन यजुःश्रुतियोंने ही इस यजुर्वेदको अभितप्त किया—इत्यादि प्रकारसे यह सब अर्थ पूर्ववत है । यह जो आदित्यका शुक्लरूप दिखायी देता है मधु है ॥ २-३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥

तृतीय खण्ड

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आदित्यकी पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्‍येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं वे ही इसकी पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, सामवेदविहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप.है ॥ १ ॥

तानि वा एतानि सामान्‍येतग्ँसामवेदमभ्यतपग्ँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यग्ँरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका अभिताप किया। उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णग्ँरूपम् ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके समीप [पश्चिम] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है यह वही है ॥ ३ ॥

| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मय इत्यादि समानम्। तथा साम्नां मधु एतदादित्यस्य कृष्णं रूपम् ॥ १–३ ॥ | ‘अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयः’इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत है। तथा सामश्रुतियोंका जो मधु है वही यह आदित्यका कृष्ण तेज है ॥१-३॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

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आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी उत्तरदिशाकी मधुनाडियाँ हैं। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥

ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [ इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णꣳरूपम् ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ उत्तर ] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है यह वही है ॥ ३ ॥

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २५३


| अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गिरसोऽथर्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः कर्माणि प्रयुक्ता मधुकृतः । इतिहासपुराणं पुष्पम् । तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पारिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः सिद्धः । मध्वेवेदादित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ‘अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयः’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । अथर्वाङ्गिरसः—अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरस कहलाते हैं; कर्ममें प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञमें पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्यका जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्ण रूप है वही मधु है ॥ १-३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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* अश्वमेधयज्ञ बहुत दिनोंमें समाप्त होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृत्तिके लिये श्रुतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिश्रवणका विधान किया है। विविध उपाख्यानादिके समुदायका नाम ‘पारिप्लव’ है; जिन रात्रियोंमें उनके श्रवणका विधान है वे ‘पारिप्लवा रात्रियाँ’ कहलाती हैं।

पञ्चम

आदित्यकी ऊर्ध्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं वे ही इसकी ऊपरकी ओरकी मधुनाडियाँ हैं। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं; [ प्रणवरूप ] ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥

ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभि-तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको अभितप्त किया। उस अभितप्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा-दित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और वह आदित्यके निकट [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध-सा होता है यही वह (मधु) है ॥ ३ ॥

| अथ येऽस्योध्र्वा रश्मय इत्यादि पूर्ववत् । गुह्या गोप्य रहस्या एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय | 'अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयः' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। गुह्य—गोपनीय अर्थात् रहस्यभूत जो आदेश हैं यानी जो लोकद्वारीयादि* |


* 'लोकद्वारमपावृणु पश्येम त्वा वयम्' (लोकका द्वार खोल दे; जिससे हम तुझे देखें) इत्यादि ही 'लोकद्वारीयादि विधियाँ' हैं।

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५५

उपासनानि च कर्माङ्गविषयाणि मधुकृतः । ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् प्रणवाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । मध्वेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव समाहितदृष्टैर्दृश्यते सञ्चलतीव ॥ १-३ ॥विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणवसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। समाहितदृष्टि पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् संचलित-सा होता दिखायी देता है वही मधु है॥१-३॥
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ते वा एते रसानाꣳरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥

वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं—वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥

ते वा एते यथोक्ता रोहितादिरूपविशेषा रसानां रसाः । केषां रसानाम् ? इत्याह—वेदा हि यस्माल्लोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति रसास्तेषां रसानां कर्मभावमापन्नानामप्येते रोहितादिविशेषा रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः ।वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप विशेष ही रसोंके रस हैं। किन रसोंके रस हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—क्योंकि लोकोंके सारभूत होनेके कारण वेद ही सार अर्थात् रस हैं और कर्मभावको प्राप्त हुए उन रसोंके भी वे रोहितादि रूप-विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं।