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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, पुरुषावयवाना हि वाक्सारिष्ठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते। <br><br> तस्या अपि वाच ऋग्रसः सारतरा। ऋचः साम रसः सारतरम्। तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ <br><br> एवम्— | उस पुरुषका भी रस वाक् है। पुरुषके अवयवोंमें वाक् ही सबसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही जाती है। उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋक्का रस साम है जो उससे भी अधिक सारतर वस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीथ (ॐकार) है। यहाँ उद्गीथ शब्दसे ओंकार ही लेना चाहिये; क्योंकि उसीका प्रकरण है, यह सामसे भी सारतर है ॥ २ ॥ <br><br> इस प्रकार — |

स एष रसानाँ२ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ॥ ३ ॥

यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होने योग्य और पृथिवी [आदि रसोंमें] आठवाँ है ॥ ३ ॥

| स एष उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामतिशयेन रसो रसतमः परमः परमात्मप्रतीकत्वात्। परार्ध्यः-अर्धं स्थानं परं च तदर्धं च परार्धं तदर्हतीति परार्ध्यः परमात्मस्थानार्हः परमात्मवदुपास्यत्वादित्यभिप्रायः। अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्गीथो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ | वह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका प्रतीक होनेके कारण परम (उत्कृष्ट) है, परार्ध्य है--अर्ध कहते हैं स्थानको जो पर होते हुए अर्ध भी हो उसका नाम परार्ध है, उसके योग्य होनेसे यह परार्ध्य है; तात्पर्य यह है कि परमात्माके समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्माका आलम्बन होने योग्य है। तथा यह जो उद्गीथ है पृथिवी आदि रसोंकी गणनामें आठवाँ है॥३॥ |

खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ [३५


उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय

वाच ऋग्रस इत्युक्तम्—वाणीका रस ऋक् है—ऐसा कहा गया—

कतमा कतमर्क्तमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥ ४ ॥

अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन-सा ऋक् है, कौन-कौन-सा साम है और कौन-कौन-सा उद्गीथ है ? ॥ ४ ॥

सा कतमा ऋक् ? कतम-<br>त्तत्साम ? कतमो वा स उद्गीथः ?<br>कतमा कतमेति वीप्सादरार्था ।कौन-सी वह ऋक् है, कौन-सा<br>वह साम है और कौन-सा वह<br>उद्गीथ है? 'कतमा-कतमा' (कौन-<br>कौन) यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ।
ननु 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच् ।' न ह्यत्र ऋग्जाति-<br>बहुत्वम्, कथं डतमच्प्रयोगः ?शङ्का—'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच्' *(५।३।९३) इस<br>पाणिनीय सूत्रके अनुसार अनेक<br>जातिके लोगोंमेंसे किसी एक जातिका<br>निश्चय करनेके लिये प्रश्न होनेपर<br>'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना<br>गया है, किंतु यहाँ ऋग्जातिकी बहु-<br>लता सम्भव नहीं है, फिर 'डतमच'<br>प्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया ?

* इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि जहाँ विभिन्न जातियोंके अनेक पदार्थ होते हैं वहाँ किसी एक जातिके पदार्थका निश्चय करनेके लिये प्रश्न उपस्थित होनेपर 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कठ आदि बहुत सी वेदशाखाएँ हैं, उनका स्वाध्याय करनेवाले द्विज लोगोंकी जाति उन्हीं शाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुई है । उनमेंसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही 'कतमः कठः' ऐसा प्रश्न किया जा सकता है । परंतु यहाँ तो ऋग्वेद एक ही जाति है, फिर इसमें 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे हो सकता है ?

छा० उ० २—