छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४२४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
४२४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
अब [श्रुति पूर्वोक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलाती है—] इसके लिये शवकर्म करें अथवा न करें, वह अर्चिरभिमानी देवताको ही प्राप्त होता है। फिर अर्चिरभिमानी देवतासे दिवसाभिमानी देवताको, दिवसाभिमानीसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायणके छः मासोंको प्राप्त होता है। मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है। वहाँसे अमानव पुरुष इन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह देवमार्ग-ब्रह्ममार्ग है। इससे जानेवाले पुरुष इस मानवमण्डलमें नहीं लौटते नहीं; लौटते ॥ ५ ॥
| अथेदानीं यथोक्तब्रह्मविदो गतिरुच्यते-यद् यदि उचैवास्मिन्नेवंविदि शव्यं शवकर्म मृते कुर्वन्ति यदि च न कुर्वन्ति ऋत्विजः सर्वथाप्येवंविन्नेन शवकर्मणाकृतेनापि प्रतिबद्धो न न ब्रह्म प्राप्नोति न च कृतेन शवकर्मणास्य कश्चनाभ्यधिको लोकः। “न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्” (बृ०उ० ४।४।२३) इति श्रुत्यन्तरात्। <br><br> शवकर्मण्यनादरं दर्शयन्विद्यां स्तौति न पुनः शवकर्मैवंविदो न कर्तव्यमिति। अक्रिय- | अब उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलायी जाती है—इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके लिये उसकी मृत्यु होनेपर ऋत्विग्गण शवकर्म करें अथवा न करें उस शवकर्मके न करनेसे भी इस प्रकार जाननेवाला वह उपासक सर्वथा प्रतिबद्ध होकर ब्रह्मको प्राप्त न होता हो—ऐसा नहीं होता और न उस शवकर्मके करनेसे इसे कोई ब्रह्मसे उत्कृष्टलोक ही प्राप्त होता है; जैसा कि “यह कर्मसे न तो बढ़ता है और न घटता ही है” इस एक अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है। <br><br> शवकर्मके प्रति अनादर प्रदर्शित करता हुआ यह मन्त्र केवल विद्याकी स्तुति करता है, इस प्रकार जाननेवालेका शवकर्म नहीं करना चाहिये—यह नहीं बतलाता। इस |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| माणे हि शवकर्माणि कर्मणां फलारम्भे प्रतिबन्धः कश्चिदनुमीयतेऽन्यत्र; यत इह विद्याफलारम्भकाले शवकर्म स्याद्वा न वेति विद्यावतोऽप्रतिबन्धेन फलारम्भं दर्शयति। ये सुखाकाशमक्षिस्थं संयद्वामो वामनीर्भामिनीरित्येवंगुणमुपासते प्राणसहितामग्निविद्यां च, तेषामन्यत् कर्म भवतु मा वा भूत्सर्वथापि तेऽर्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। <br><br> अर्चिषोऽर्चिर्देवताया अहरहरभिमानिनीं देवतामह्न आपूर्यमाणपक्षं शुक्लपक्षदेवतामापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमेति सविता तान्मासानुत्तरायणदेवतां तेभ्यो मासेभ्यः | विद्वान्के सिवा अन्य किसीके लिये तो शवकर्म न करनेपर उसके कर्मफलके आरम्भमें कुछ प्रतिबन्ध होनेका अनुमान किया जाता है; क्योंकि यहाँ श्रुति उपासनाका फल आरम्भ होनेके समय केवल उपासकके लिये ही—उसका शवकर्म किया जाय अथवा न किया जाय—अप्रतिबन्धपूर्वक फलका आरम्भ दिखलाती है। जो लोग नेत्रमें स्थित संयद्वाम, वामनी और भामनी इत्यादि गुणोंसे युक्त सुखाकाशकी उपासना करते हैं तथा प्राणसहित अग्निविद्याकी उपासना करते हैं—उनका अन्य कर्म हो अथवा न हो—वे सर्वथा अर्चिरभिमानी देवताको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> अर्चिः—अर्चिरभिमानी देवतासे अहः—अहरभिमानी (दिवसाभिमानी) देवताको, अहरभिमानी देवतासे आपूर्यमाण पक्ष—शुक्लपक्षदेवताको, शुक्लपक्षसे षडुदङ्—जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशामें चलता है उन महीनोंको अर्थात् उत्तरायण-देवताको, उन उत्तरायणके छः महीनोंसे संवत्सर—संवत्सरा- |