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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| यद्वै तत्त्रिपादमृतं गायत्रीमुखेनोक्तं ब्रह्मेतीदं वाव तदिदमेव तयोऽयं प्रसिद्धो बहिर्धा बहिः पुरुषादाकाशो भौतिको यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाश उक्तः ॥७॥ अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुषे शरीर आकाशः । | जो कभी गायत्रीके द्वारा कहा हुआ वह त्रिपाद् अमृत ब्रह्म है वह यही है—वह निश्चय यही है जो कि यह बाहरकी ओर—पुरुषसे बाहर प्रसिद्ध भौतिक आकाश है । तथा जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश बतलाया गया है ॥७॥ वह यही है जो पुरुष अर्थात् शरीरके भीतर आकाश है । |
| यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः ॥८॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदये हृदयपुण्डरीक आकाशः । | जो भी वह पुरुषके भीतर आकाश है ॥८॥ वह यही है जो यह हृदयके भीतर अर्थात् हृदयपुण्डरीकमें आकाश है । |
| कथमेकस्य सत आकाशस्य त्रिधा भेद इति ? उच्यते— बाह्येन्द्रियविषये जागरितस्थाने नभसि दुःखबाहुल्यं दृश्यते ततोऽन्तःशरीरे स्वप्नस्थानभूते मन्दतरं दुःखं भवति स्वप्नान् पश्यतः । हृदयस्थे पुनर्नभसि न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति । अतः सर्वदुःखनिवृत्तिरूपमाकाशं सुषुप्तस्थानम् । | एक होनेपर भी आकाशका तीन प्रकारका भेद क्यों है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है—जो बाह्य इन्द्रियोंका विषय है और जिसकी जाग्रत् अवस्थामें उपलब्धि होती है ऐसे इस आकाशमें दुःखकी बहुलता देखी जाती है । उसकी अपेक्षा स्वप्नमें उपलब्ध होनेवाले शरीरान्तर्गत आकाशमें स्वप्न देखनेवाले पुरुषको मन्दतर दुःख होता है । किन्तु हृदयस्थ आकाशमें जीव न तो किसी भोगकी इच्छा करता है और न कोई स्वप्न ही देखता है; अतः सुषुप्तिमें उपलब्ध होनेवाला आकाश सम्पूर्ण दुःखोंका निवृत्तिरूप है । |

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ २८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा भेदान्वाख्यानम् ।इसलिये एक ही आकाशके तीन भेदोंका कथन उचित ही है।
बहिर्धा पुरुषादारभ्याकाशस्य हृदये संकोचकरणं चेतःसमाधानस्थानस्तुतये यथा “त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । अर्धतस्तु कुरुक्षेत्रमर्धतस्तु पृथूदकम्” इति तद्वत् ।पुरुषके बहिःस्थित आकाशसे लेकर जो हृदयदेशमें आकाशका संकोच किया गया है वह चित्तकी एकाग्रताके स्थानकी स्तुतिके लिये है; जिस प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके लिये ही ऐसा कहा जाता है—]“तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्र उत्कृष्ट है तथा [ द्विदल धान्यके समान ] आधेमें कुरुक्षेत्र है और आधेमें 'पृथूदक' है” उसी प्रकार [ यहाँ हृदयाकाशकी स्तुति समझनी चाहिये ] ।
तदेतद्धार्दाकाशाख्यं ब्रह्म पूर्णं सर्वगतं न हृदयमात्रपरिच्छिन्नमिति मन्तव्यम्, यद्यपि हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । अप्रवर्ति न कुतश्चित्क्वचित्प्रवर्तितं शीलमस्येत्यप्रवर्ति तदनुच्छित्तिधर्मकम् । यथान्यानि भूतानि परिच्छिन्नान्युच्छित्तिधर्मकाणि न तथा हार्दं नभः। पूर्णमप्रवर्तिनी-वह यह हृदयाकाशसंज्ञक ब्रह्म पूर्ण—सर्वगत है, वह केवल हृदयमात्रमें ही परिच्छिन्न है—ऐसा नहीं मानना चाहिये; यद्यपि चित्त केवल हृदयाकाशमें ही समाहित किया जाता है । वह अप्रवर्ति अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला है—जिसका कभी कहीं प्रवृत्त होनेका स्वभाव न हो उसे अप्रवर्ति कहते हैं । जिस प्रकार अन्य परिच्छिन्न भूत उच्छित्ति(विनाश) धर्मवाले हैं उसी प्रकार हृदयाकाश नाशवान् नहीं है । जो पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त पूर्ण और अविनाशी