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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| स्पृशति; अविद्यानिमित्ताभावात्। | उसमें उसके अविद्यारूप निमित्तका अभाव है। |
| ये तूच्छिन्नदोषैर्मृदितकषायैर्मानसाः सत्याः कामा अनृतापिधाना अनुभूयन्ते विद्याभिव्यङ्ग्यत्वात्, त एवं मुक्तेन सर्वात्मभूतेन सम्बध्यन्त इत्यात्मज्ञानस्तुतये निर्दिश्यन्तेऽतः साध्वेवद्विशिनष्टि—‘य एते ब्रह्मलोके’ इति । यत्र क्वचन भवन्तोऽपि ब्रह्मण्येव हि ते लोके भवन्तीति सर्वात्मत्वाद्ब्रह्मण उच्यन्ते । | किंतु जिनके दोष नष्ट हो गये हैं और राग-द्वेषादि कषाय क्षीण हो गये हैं उन रुपोंद्वारा, मिथ्या विषयाभिनिवेशरूप अनृतके कारण अज्ञानियोंके अनुभवमें न आनेवाले जिन मानस सत्य भोगोंका अनुभव किया जाता है वे विद्याद्वारा अभिव्यक्त होनेवाले होनेके कारण इस प्रकार उपर्युक्त सर्वात्मभूत विद्वान्‌से सम्बन्धित हैं; इसीसे आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये उनका निर्देश किया जाता है। अतः ‘य एते ब्रह्मलोके’ ऐसा जो निर्देश किया गया है वह ठीक ही है, क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक है, अतः वे कहीं भी रहें तथापि ब्रह्मलोकमें ही हैं—इस प्रकार कहे जाते हैं। |
| ननु कथमेकः सन्नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा[कामांश्च ब्राह्मलौकिकान् पश्यन्रमत इति च विरुद्धम्। यथैको यस्मिन्नेव क्षणे | शङ्का—किंतु ‘वह एक होता हुआ न तो अन्य कुछ देखता है, न अन्य कुछ सुनता है और न अन्य कुछ जानता है’ ‘वह भूमा है’ और ‘वह ब्रह्मलोकसम्बन्धी भोगोंको देखता हुआ रमण करता है’ ये दोनों कथन तो परस्परविरुद्ध हैं, जिस प्रकार यह कहा जाय कि एक पुरुष |

खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१९
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
पश्यति स तस्मिन्नेव क्षणे न पश्यति ।जिस क्षणमें देखता है उसी क्षणमें नहीं भी देखता ।
नैष दोषः; श्रुत्यन्तरे परिहृतत्वात्। द्रष्टुर्दृष्टेरविपरिलोपात्पश्यन्नेव भवति; द्रष्टुरन्यत्वेन कामानांमभावान्न पश्यति चेति। यद्यपि सुषुप्ते तदुक्तं मुक्तस्यापि सर्वैकत्वात्समानो द्वितीयाभावः। 'केन कं पश्येत्' इति चोक्तमेव।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक अन्य श्रुतिमें इसका निराकरण कर दिया गया है। द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप न होनेके कारण वह देखता ही रहता है और द्रष्टासे भिन्न भोगोंका अभाव होनेके कारण वह नहीं भी देखता। यद्यपि सुषुप्तिमें वह (द्वैताभाव) बतलाया गया है तथापि मुक्तके लिये भी सब कुछ एकरूप होनेके कारण समानरूपसे द्वैताभाव है। इस विषयमें 'किसके द्वारा क्या देखे' ऐसा कहा ही गया है।
अशरीरस्वरूपोऽपहतपाप्मादिलक्षणः सन् कथमेष पुरुषोऽक्षिणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजापतिना ? तत्र यथासावक्षिणि साक्षाद्दृश्यते तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते । तत्र को हेतुरक्षिणि दर्शन इत्याह—यह पुरुष अशरीररूप और अपहतपाप्मादि लक्षणोंवाला होनेपर भी नेत्रमें दिखलायी देता है—ऐसा प्रजापतिने क्यों कहा ? ऐसी शङ्का होनेपर जिस प्रकार यह नेत्रमें साक्षात् दिखलायी देता है वह बतलाना चाहिये—इसीसे यह (आगेका वक्तव्य) आरम्भ किया जाता है। नेत्रके भीतर उसके दिखलायी देनेमें क्या कारण है, सो श्रुति बतलाती है—