छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
३५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| क्षीर्मा दहत्वित्यर्थः । पुरुषव्यत्ययेन मा प्रधाक्षीदिति ॥२॥ | डाले। यहाँ पुरुषका परिवर्तन करके ['मा प्रधाक्षी:'※के स्थानमें] 'मा प्रधाक्षीत्' ऐसा पाठ समझना चाहिये ॥२॥ |
तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तँसयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँसयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥
उससे दूसरे [अग्रगामी] हंसने कहा—'अरे ! तू किस महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ? क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है ?' [इसपर उसने पूछा—] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ॥ ३ ॥
| [जानश्रुतेर्निकृष्टत्वकथनम्] तमेवमुक्तवन्तं पर इतरोऽग्रगामी प्रत्युवाचारे निकृष्टोऽयं राजा वराकस्तं कम् उ एनमेतत्सन्तं केन माहात्म्येन युक्तं सन्तमिति कुत्सयत्येनमेवं सबहुमानमेतद्वचनमात्थ ? रैक्वमिव सयुग्वानं सह युग्वना गन्त्र्या वर्तत इति सयुग्वा रैक्वः, तमि- | इस प्रकार कहते हुए उस हंससे दूसरे आगे चलनेवाले हंसने कहा—अरे ! यह बेचारा राजा तो बहुत तुच्छ है। भला किस रूपमें वर्तमान-कैसे महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति तू इस प्रकार यह अत्यन्त सम्मानपूर्ण शब्द कह रहा है—ऐसा कहकर वह उसकी अवज्ञा करता है—क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान [बतलाता है ?] जो युग्वा अर्थात् गाड़ीके साथ स्थित है उसे सयुग्वा कहते हैं; ऐसा जो रैक्व है उसके समान तू |
※ क्योंकि 'प्रधाक्षी:' मध्यम पुरुषकी क्रिया है और इसका कर्ता है 'ज्योति:' जो प्रथम पुरुष है। इसलिये इसका रूप भी प्रथम पुरुषके अनुसार 'प्रधाक्षीत्' ऐसा होना चाहिये ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थं [ ३५७
| वात्थैनम् ? अननुरूपमस्मिन्, न युक्तमीदृशं वक्तुं रैक्व इवेत्यभिप्रायः। इतरश्चाह—यो नु कथं त्वयोच्यते सयुग्वा रैक्वः। इत्युक्तवन्तं भल्लाक्ष आह—शृणु यथा स रैक्वः॥ ३॥ | इसे बतला रहा है? यह कथन इसके अनुरूप नहीं है; अर्थात् 'यह रैक्वके समान है' ऐसा कहना उचित नहीं। इसपर दूसरेने कहा—'जिसके विषयमें तुम कह रहे हो वह गाड़ीवाला रैक्व कैसा है?' ऐसा कहनेवाले उस हंससे भल्लाक्ष बोला—'जैसा वह रैक्व है, सुन' ॥ ३ ॥ |
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनꣳसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्तत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
जिस प्रकार [द्यूतक्रीडामें] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस (रैक्व) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है उसे जो कोई भी जानता है उसके विषयमें भी मैंने यह कह दिया ॥ ४ ॥
| [रैक्वस्य महत्त्वम्]<br>यथा लोके कृतायः कृतो नामायो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः, स यदा जयति द्यूते प्रवृत्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे त्रिद्व्येकाङ्का अधरेयास्त्रेताद्वापरकलिना- | जिस प्रकार लोकमें द्यूतक्रीडाके समय जो चार अङ्कवाला कृत-नामक पासा प्रसिद्ध है, जब द्यूतमें प्रवृत्त हुए पुरुषोंका वह कृतनामक पासा जय प्राप्त करता है तो उसके द्वारा विजय प्राप्त करनेवालेको ही तीन, दो और एक अङ्कसे युक्त त्रेता, द्वापर और कलिनामक |