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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

संस्कृतहिन्दी
केयं संवृतिर्नाम-किमसावभाव उत भाव इति ? यद्यभावः, दृष्टान्ताभावः । अथ भावः, तथापि नाभावादङ्कुरोत्पत्तिः, बीजावयवेभ्यो ह्यङ्कुरोत्पत्तिः ।<br><br>अवयवा अप्युपमृद्यन्त इति चेत् ? न; तदवयवेषु तुल्यत्वात् । यथा वैनाशिकानां बीजसंस्थानरूपोऽवयवी नास्ति, तथावयवा अपीति तेषामप्युपमर्दानुपपत्तिः । बीजावयवानामपि सूक्ष्मावयवास्तदवयवानामप्यन्ये सूक्ष्मतरावयवा इत्येवं प्रसङ्गस्यानिवृत्तेः सर्वत्रोपमर्दानुपपत्तिः । सद्बुद्ध्यनुवृत्तेः सत्त्वानिवृत्तिश्चेति तद्वादिनां सतचीज है। यह भाव है या अभाव ? यदि अभाव है तो [अभावसे भावकी उत्पत्ति होनेमें ] कोई दृष्टान्त नहीं है। [ अतः अभावरूपा संवृत्ति बीजकी सत्ताकी साधिका नहीं हो सकती ] और यदि भाव है तो भी अभावसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अङ्कुरकी उत्पत्ति तो बीजके अवयवोंसे ही होती है ।<br><br>और यदि ऐसा मानें कि अवयवोंका भी नाश हो जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह दोष अवयवीके समान ही उसके अवयवोंमें भी है । जिस प्रकार वैनाशिकोंके मतमें बीजसंस्थानरूप अवयवी नहीं है उसी प्रकार अवयव भी नहीं हैं; अतः उनका नाश होना सम्भव नहीं है । बीजावयवोंके भी सूक्ष्म अवयव होने चाहिये और उन अवयवोंके भी दूसरे सूक्ष्मतर अवयव होने चाहिये-इस प्रकार प्रसङ्गकी अनिवृत्ति ( अनवस्था दोष ) होनेके कारण सर्वत्र नाश होना सम्भव नहीं है । तथा सर्वत्र सद्बुद्धिकी अनुवृत्ति होनेके कारण सत्त्वकी निवृत्ति नहीं होगी । इस प्रकार सद्वादियोंकी मानी हुई सत्से सत्की उत्पत्ति

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्याथ ५९१


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
एव सदुत्पत्तिः सेत्स्यति। न त्वसद्वादिनां दृष्टान्तोऽस्त्यसतः सदुत्पत्तेः। मृत्पिण्डाद्घटोत्पत्तिर्दृश्यते सद्वादिनां तद्भावे भावात्तदभावे चाभावात्।ही सिद्ध होगी। असत्से सत्की उत्पत्ति होनेमें असद्वादियोंके पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है। सद्वादियोंके मतमें मृत्तिकाके पिण्डसे घटकी उत्पत्ति होती देखी गयी है; क्योंकि उसकी सत्ताके रहते हुए घटकी भी सत्ता है और उसका अभाव होनेपर घटका भी अभाव हो जाता है।
यद्यभावादेव घट उत्पद्येत घटार्थिना मृत्पिण्डो नोपादीयेत। अभावशब्दबुद्ध्यनुवृत्तिश्च घटादौ प्रसज्येत न त्वेतदस्त्यतो नासतः सदुत्पत्तिः।यदि अभावसे ही घटकी उत्पत्ति होती तो घट बनानेकी इच्छावालेको मृत्तिकाका पिण्ड लेनेकी आवश्यकता न होती तथा घटादिमें 'अभाव' शब्द और अभाव-बुद्धिकी अनुवृत्तिका भी प्रसंग उपस्थित होता। किंतु ऐसा नहीं। इसलिये असत्से सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
यदप्याहुर्मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेर्निमित्तमिति मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेः कारणमुच्यते, न तु परमार्थत एव मृद्घटो वास्तीति; तदपि मृद्बुद्धिर्विद्यमाना विद्यमानाया एव घटबुद्धेः कारणमिति नासतः सदुत्पत्तिः।इसके सिवा वे लोग जो ऐसा कहते हैं कि 'मृत्तिकाबुद्धि घटबुद्धिका निमित्त है; अतः मृद्बुद्धि ही घटबुद्धिका कारण कही जाती है, वस्तुतः मृत्तिका अथवा घट कुछ भी नहीं है' इसके अनुसार भी विद्यमान मृद्बुद्धि ही विद्यमान घटबुद्धिका कारण है; अतः असत्से सत्की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती।