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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| यजुष ऋग्यजुःसामसंबद्धात्कर्मणोऽभ्युत्थायेत्यर्थः। तेन कर्मणा मृत्युभयापगमं प्रति निराशास्तदपास्यामृताभयगुणमक्षरं स्वरं स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्टवन्तः; ॐकारोपासनपराः संवृत्ताः। एवशब्दोऽवधारणार्थः सन्समुच्चयप्रतिषेधार्थः। तदुपासनपराः संवृत्ता इत्यर्थः ॥३॥ | होकर ऊपरकी ओर उठे । उस कर्मसे मृत्युके भयकी निवृत्तिके प्रति निराश होनेके कारण वे उसे छोड़-कर अमृत और अभय गुणविशिष्ट अक्षर यानी स्वरमें—स्वरसंज्ञक अक्षरमें ही प्रविष्ट हो गये अर्थात् ओंकारोपासनामें तत्पर हो गये । यहाँ 'एव' शब्द अवधारणके लिये होकर [ पूर्व स्थानोंके साथ स्वरके ] समुच्चयका प्रतिषेध करनेके लिये है । तात्पर्य यह है कि वे उसीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥ |

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ओंकारका उपयोग और महत्त्व

कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्वमक्षरस्य ? इत्युच्यते—किंतु वह अक्षर 'स्वर' शब्दका वाच्यार्थ किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है—

य दा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣲ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥

जिस समय [ उपासक अध्ययनद्वारा ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ॐ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुःको भी प्राप्त करता है । यह जो अक्षर है, वह अन्य स्वरोंके समान स्वर है । यह अमृत और अभयरूप है, इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


| यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्ये- <br> वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः। एष <br> उ स्वरः। कोऽसौ ? यदेतदक्षरमे- <br> तदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- <br> गुणमेवामृता अभयाश्चाभवन् <br> देवाः ॥ ४ ॥ | जिस समय [ उपासक ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुको भी प्राप्त करता है । यही स्वर है; वह स्वर कौन है ? यह जो अक्षर है, यह अमृत और अभयरूप है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥ |

ओंकारोपासनाका फल

स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरँ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५ ॥

| स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- <br> रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- <br> ति स्तौति–उपासनमेवात्र स्तुति- | उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी प्रकार अमृत और अभयगुणसे विशिष्ट जानता हुआ उसकी स्तुति करता है– यहाँ स्तुतिका अभिप्राय उपासना |