छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवति, उत्तरमार्गप्रतिपत्तिहेतुरि-<br>त्यर्थः, यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति । एवं-<br>विदं ह वै ब्रह्माणमृत्विजं प्रत्ये-<br>षानुगाथा ब्रह्मणः स्तुतिपरा—<br>यतो यत आवर्तते कर्म प्रदेषादृ-<br>त्विजां यज्ञः क्षतीभवंस्तत्तद्यज्ञस्य<br>क्षतरूपं प्रतिसंदधत्प्रायश्चित्तेन<br>गच्छति परिपालयतीत्येतत् ॥९॥ | दक्षिण ओर उठा हुआ—अर्थात्<br>उत्तरमार्गकी प्राप्तिका हेतु होता है।<br>इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्मा<br>ऋत्विक्के विषयमें ही ब्रह्माकी<br>स्तुति करनेवाली यह अनुगाथा है-<br>जिस-जिस प्रदेशसे कर्म आवृत्त होता<br>है अर्थात् होता आदि ऋत्विजोंका<br>यज्ञ क्षतयुक्त होता है उस-उस<br>यज्ञके क्षतकी प्रायश्चित्तसे पूर्ति करता<br>हुआ ब्रह्मा जाता है अर्थात् यज्ञकर्त्ता-<br>की सब प्रकार रक्षा करता है ॥ ९ ॥ |
मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानँसर्वाँश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविद्मेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥१०॥
एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओंकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ॥ १० ॥
| मान वो ब्रह्मा मौनाचरणान्म-<br>ननाद्वा ज्ञानवत्त्वात्ततो ब्रह्मैवैक-<br>र्त्विक्कु रून्र्कतॄ न् योद्धनारूढानश्वा | मौनाचरण करनेसे अथवा मनन<br>करनेके कारण ब्रह्मा मानव है;<br>अतः ज्ञानवान् होनेके कारण<br>ब्रह्मा ही एक ऋत्विक् है। जिस<br>प्रकार युद्धमें घोड़ी ‘कुरून्’-- |
खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१
| वडवा यथाभिरक्षत्येवंविद् ह वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तत्कृतदोषायनयनात् । यत एवं विशिष्टो ब्रह्मा विद्वान्, तस्मादेवंविदम् एव यथोक्तव्याहृत्यादिविदं ब्रह्माणं कुर्वीत, नानेवंविदं कदाचनेति । द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः ॥ १० ॥ | कर्ताओंकी यानी अपनी पीठपर चढ़े हुए योद्धाओंकी सब प्रकारसे रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान और समस्त ऋत्विजोंकी, उनके किये हुए दोषोंकी निवृत्ति करके, सब ओरसे रक्षा करता है। क्योंकि विद्वान् ब्रह्मा ऐसा विशिष्टगुणसम्पन्न होता है इसलिये इस प्रकार—उपर्युक्त व्याहृति आदिका ज्ञान रखनेवालेको ही ब्रह्मा बनावे; इस प्रकार न जाननेवालेको कभी न बनावे। 'नानेवंविदं नानेवंविदम्' यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १० ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥ ४ ॥
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