छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| मृचापि मन्त्रेणाभ्यनूक्तं प्रकाशितम् ॥ ५ ॥ | अनुगत और गायत्रीद्वारा ही प्रतिपादित है, ऋचा यानी मन्त्रसे भी प्रकाशित किया गया है ॥ ५ ॥ |
कार्यब्रह्म और शुद्ध ब्रह्मका भेद
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥
[ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस (गायत्र्याख्य ब्रह्म) की महिमा है; तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका [ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ॥ ६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तावानस्य गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूतिविस्तारः । यावांश्चतुष्पात्षड्विधश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गायत्रीति व्याख्यातः । अतस्तस्माद्विकारलक्षणाद्गायत्र्याख्याद्वाचारम्भणमात्रात्ततो ज्यायान्महत्तरश्च परमार्थसत्यरूपोऽविकारः पूरुषः पुरुषः सर्वपूरणात्पुरिशयनाच्च । | इस गायत्रीसंज्ञक समस्त (पादविभागविशिष्ट) ब्रह्मकी उतनी ही महिमा—विभूतिविस्तार है, जितना कि चार पादवाला और छः प्रकारका ब्रह्मका विकारभूत एक पाद गायत्री है; ऐसा कहकर निरूपण किया गया है। अतः उस विकारभूत वाचारम्भणमात्र गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मसे परमार्थ सत्यस्वरूप निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट महत्तर है; जो सबको पूरित करने तथा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है। |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८५
| तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि भूतानि तेजोऽबन्नादीनि सस्थावरजङ्गमानि । त्रिपात्त्रयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपात् । त्रिपादामृतं पुरुषाख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मनो दिवि द्योतनवति स्वात्मन्यवस्थितमित्यर्थ इति ॥ ६ ॥ | तेज, अन्न और अप् आदि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुषका एक पाद हैं । तथा वह त्रिपात्—जिसके तीन पाद हों उसे 'त्रिपात्' कहते हैं—समस्त गायत्रीरूप पुरुषका पुरुषसंज्ञक त्रिपादामृत दिवि—द्युतिमान्में यानी प्रकाशस्वरूप स्वात्मामें स्थित है—ऐसा इसका तात्पर्य है॥६॥ |
— : ० : —
भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद
यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७॥ अयं वाव स योऽयमन्त पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनों२श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ९ ॥
जो भी वह [त्रिपाद् अमृतरूप] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकाश है; और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है; तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है। वह यही है जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ७–९ ॥