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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| बुद्ध्या संतप्ये सर्वदा तं मा मां शोकसागरस्य पारमन्तं भगवांस्तारयत्वात्मज्ञानोडुपेन कृतार्थबुद्धिमापादयत्वभयं गमयत्वित्यर्थः ।<br><br>तमेवमुक्तवन्तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा अधीतवानसि, अध्ययनेन तदर्थज्ञानमुपलक्ष्यते, ज्ञानवानसीत्येतन्नामैवैतत् ।<br><br>“वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः ॥ ३ ॥ | बुद्धिसे सर्वदा संतप्त रहता हूँ । उसे मुझको हे भगवन् ! आत्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा शोकसागरके पार—परे पहुँचा दो—मुझे कृतार्थबुद्धि प्राप्त करा दो अर्थात् अभयको प्राप्त करा दो ।<br><br>इस प्रकार कहते हुए उन (नारदजी) से सनत्कुमारजीने कहा--‘तुमने यह जो कुछ अध्ययन किया है—अध्ययनसे उसके अर्थका ज्ञान भी उपलक्षित होता है--[ अतः तात्पर्य यह है कि ] तुम जो कुछ जानते हो वह सब नाम ही है; क्योंकि “विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है” ऐसी श्रुति है ॥ ३ ॥ |


नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्देवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ॥ ४ ॥

ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या,

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१९


भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतादिकला और शिल्पविद्या--
ये सब भी नाम ही हैं तुम नामकी उपासना करो ॥ ४ ॥

| नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेद इत्यादि नामैवैतत् । नामोपास्स्व ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्ध्या । यथा प्रतिमां विष्णुबुद्ध्योपास्ते तद्वत् ॥ ४ ॥ | ऋग्वेद नाम ही है, तथा यजुर्वेद इत्यादि ये सब भी नाम ही हैं । अतः जिस प्रकार विष्णु-बुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते हैं उसी प्रकार तुम नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करो ॥ ४ ॥ |


स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥

वह जो कि नामको 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद-- ] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार-- ] 'नामसे भी अधिक है ।' [ नारद— ] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥

| स यस्तु नाम ब्रह्मेत्युपास्ते तस्य यत्फलं भवति तच्छृणु,—या- | वह जो कि 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे जो फल मिलता है वह सुनो--जहाँतक |