छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
| यत्र नान्यत्पश्यतीत्यधिकर- <br> णाधिकर्तव्यतानिर्देशात्स एवा- <br> धस्तादिति च परोक्षनिर्देशाद्- <br> द्रष्टुर्जीवादन्यो भूमा स्यादि- <br> त्याशङ्का कस्यचिन्मा भूदित्यथा- <br> तोऽनन्तरमहङ्कारादेशोऽहङ्कारे- <br> णादिश्यत इत्यहङ्कारादेशः । <br> द्रष्टुरनन्यत्वदर्शनार्थं भूमैव <br> निर्दिश्यतेऽहङ्कारेणाहमेवाध- <br> स्तादित्यादिना ॥१॥ | 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, इस वाक्यसे आधार-आधेयताका निर्देश होनेसे तथा 'वही नीचे है' इत्यादि वाक्यसे परोक्ष निर्देश होनेसे किसीको ऐसी शङ्का न हो जाय कि भूमा द्रष्टा जीवसे भिन्न है 'इसलिये अब—इसके पश्चात् अहंकारादेश किया जाता है । अहंकाररूपसे आदेश (उपदेश) किया जाता है इसलिये इसे अहंकारादेश कहा है । द्रष्टासे अभिन्नत्व दिखलानेके लिये भूमाका ही 'मैं ही नीचे हूँ' इत्यादि वाक्यद्वारा अहंकाररूपसे निर्देश किया जाता है ॥ १ ॥ |
<div align="center">—:०:—</div>| अहङ्कारेण देहादिसङ्घातो- <br> ऽप्यादिश्यतेऽविवेकिभिरित्यतस्त- <br> दाशङ्का मा भूदिति— | अविवेकी लोग अहंकारसे देहादि संघातका भी आदेश करते हैं; अतः ऐसी आशङ्का न हो इसलिये— |
अथात आत्मादेश एव आत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टा-
दात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत
आत्मैवेदꣳसर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं
विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स
स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति अथ
खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाꣳ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥
अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है । आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर है और आत्मा ही यह सब है । वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है; वह स्वराट् है; सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती है । किंतु जो इससे विपरीत जानते हैं वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और है, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथानन्तरमात्मादेश आत्मनैव केवलेन सत्स्वरूपेण शुद्धेनादिश्यते । आत्मैव सर्वतः सर्वमित्येवमेकमजं सर्वतो व्योमवत्पूर्णमनन्यशून्यं पश्यन्स वा एष विद्वान्मननविज्ञानाभ्यामात्मरतिरात्मन्येव रती रमणं यस्य सोऽयमात्मरतिः। तथात्मक्रीडः। देहमात्रसाधना रतिर्बाह्यसाधना क्रीडा । लोके स्त्रीभिः सखिभिश्च | अब आगे आत्मादेश है अर्थात् केवल सत्स्वरूप शुद्ध आत्माके द्वारा ही आदेश किया जाता है । सब ओर सब कुछ आत्मा ही है । इस प्रकार आकाशके समान सर्वत्र पूर्ण एक अज और अनन्य आत्माको देखनेवाला वह यह विद्वान् मनन और विज्ञानके कारण आत्मरति—आत्मामें ही जिसकी रति अर्थात् रमण है ऐसा आत्मरति और आत्मक्रीड होता है । रतिका साधन केवल देह है और क्रीडा बाह्य साधनवाली होती है, क्योंकि लोकमें 'स्त्रियों और मित्रोंके साथ क्रीडा |