छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ऋचीव साम । तस्मादत एव कारणादृच्यध्यूढमेव साम गीयत इदानीमपि सामगैः ।<br><br>यथा च ऋक्सामनी नात्यन्तं भिन्ने अन्योन्यं तथैतौ पृथिव्याग्नी । कथम् ? इयमेव पृथिवी सा सामनामार्धशब्दवाच्या । इतरार्धशब्दवाच्योऽग्निरमस्तदेतत्पृथिव्यग्निद्वयं सामैकशब्दाभिधेयत्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं भिन्नं पृथिव्यग्निद्वयं नित्यसंश्लिष्टमृक्सामनी इव। तस्माच्च पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वमित्यर्थः ।<br><br>सामाक्षरयोः पृथिव्यग्निदृष्टिविधानार्थमियमेव साग्निरम इति केचित् ॥ १ ॥ | ऋक्में अधिष्ठित रहता है । अतः इस समय भी सामगान करनेवाले द्विजोंद्वारा ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ।<br><br>जिस प्रकार ऋक् और साम परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार ये पृथिवी और अग्नि भी अत्यन्त भिन्न नहीं हैं । यह किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] यह पृथिवी ही ‘सा’—‘साम’ नामके आधे शब्दद्वारा प्रतिपाद्य है तथा उसके अन्य नामार्ध ‘अम’ शब्दका वाच्य अग्नि ‘अम’ है । इस प्रकार ‘साम’ इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त हुए वे ही ये पृथिवी और अग्नि दोनों साम कहे जाते हैं । अतः ऋक् और सामके समान सर्वदा मिले-जुले रहनेके कारण ये पृथिवी और अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं हैं । भाव यह कि इसीसे पृथिवी और अग्निको ऋक् एवं साम कहा गया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि ‘साम’ शब्दके अक्षरोंमें पृथिवी और अग्निदृष्टिका विधान करनेके लिये ही ‘इयमेव सा अग्निरमः’ ऐसा उपदेश किया गया है ॥ १ ॥ |
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खण्ड ६] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥
अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह साम इस ऋक्में अधिष्ठित है; अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही 'सा' है और वायु 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ २ ॥
द्यौ रेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम। तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
द्यौ ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह यह [ आदित्यरूप ] साम इस [ द्यौरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। द्यौ ही 'सा' है और आदित्य 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः सामेत्यादि पूर्ववत् ॥ २-३ ॥ | अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २-३ ॥ |
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नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥
नक्षत्र ही ऋक् हैं और चन्द्रमा साम है। वह यह [ चन्द्रमारूप ] साम इस [ नक्षत्ररूप ] ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। नक्षत्र ही 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ४ ॥