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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५९६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तत्सदैक्षतेक्षां दर्शनं कृतवत् । अतश्च न प्रधानं सांख्यपरिकल्पितं जगत्कारणम्; प्रधानस्याचेतनत्वाभ्युपगमात्, इदं तु सचेतनमीक्षितृत्वात्। तत्कथमैक्षत ? इत्याह—बहु प्रभूतं स्यां भवेयं प्रजायेय प्रकर्षेणोत्पद्येय । यथा मृद्घटाद्याकारेण, यथा वा रज्ज्वादि सर्पाद्याकारेण बुद्धिपरिकल्पितेन । | उस सत्‌ने ईक्षण किया, ईक्षण अर्थात् दर्शन किया। इससे सिद्ध होता है कि सांख्यका कल्पना किया हुआ प्रधान जगत्‌का कारण नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन माना गया है और यह सत् ईक्षण करनेके कारण चेतन है। उसने किस प्रकार ईक्षण किया सो श्रुति बतलाती है—मैं बहु—अधिक हो जाऊँ 'प्रजायेय'—प्रकर्षसे उत्पन्न होऊँ, जिस प्रकार कि घटादि आकारसे मृत्तिका अथवा बुद्धिसे कल्पना किये हुए सर्पादि आकारसे रज्जु उत्पन्न होती है। |
| असदेव तर्हि सर्वं यद्गृह्यते रज्जुरिव सर्पाद्याकारेण । | शङ्का--तब तो रज्जु जिस प्रकार सर्पादि आकारसे ग्रहण की जाती है उसी प्रकार जो कुछ ग्रहण किया जाता है वह असत् ही है। |
| न; सत एव द्वैतभेदेनान्यथागृह्यमाणत्वान्नासत्त्वं कस्यचित्क्वचिदिति ब्रूमः । यथा सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं परिकल्प्य पुनस्तस्यैव प्रागुत्पत्तेः प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमसत्त्वं ब्रुवते तार्किका न तथा- | समाधान--नहीं, हमारा तो यह कथन है कि द्वैतभेदसे सत् ही अन्यथारूपसे गृहीत होनेके कारण कभी किसी पदार्थकी असत्ता नहीं है। [ अब इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते हैं-- ] जिस प्रकार तार्किक लोग सत्‌से भिन्न किसी अन्य पदार्थकी कल्पना कर फिर उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उसकी असत्ता बतलाते हैं |

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९७
संस्कृतहिन्दी
स्माभिः कदाचित्क्वचिदपि स-<br>तोऽन्यदभिधानमभिधेयं वा वस्तु<br>परिकल्प्यते । सदैव तु सर्व-<br>मभिधानमभिधीयते च यदन्य-<br>बुद्ध्या । यथा रज्जुरेव सर्प-<br>बुद्ध्या सर्प इत्यभिधीयते यथा<br>वा पिण्डघटादि मृदोऽन्यबुद्ध्या<br>पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते<br>लोके । रज्जुविवेकदर्शिनां तु<br>सर्पाभिधानबुद्धी निवर्तेते यथा च<br>मृद्विवेकदर्शिनां घटादिशब्द-<br>बुद्धी तद्वत्सद्विवेकदर्शिनामन्य-<br>विकारशब्दबुद्धी निवर्तेते ।<br>“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य<br>मनसा सह” (तै० उ. २।४)<br>इति । “अनिरुक्तेऽनिलयने”<br>(तै० उ० २ । ६ । १) इत्यादि<br>श्रुतिभ्यः ।उसी प्रकार हमारेद्वारा कभी कहीं<br>भी सत्‌से भिन्न किसी नाम अथवा<br>नामकी विषयभूत वस्तुकी कल्पना<br>नहीं की जाती । सारे नाम और<br>जो अन्यबुद्धिसे कहे जाते हैं वे<br>सारे पदार्थ सत् ही हैं, जिस प्रकार<br>कि लोकमें रज्जु ही सर्पबुद्धिसे<br>‘सर्प’ इस प्रकार कही जाती है<br>अथवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य-<br>बुद्धिके कारण पिण्ड और घटादिको<br>पिण्ड एवं घट आदि शब्दोंसे पुकारा<br>जाता है । जिस प्रकार रज्जुका<br>विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें<br>‘सर्प’ शब्द और सर्पबुद्धि निवृत्त हो<br>जाते हैं तथा मृत्तिकाका विवेक<br>करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें घटादि-<br>शब्द और तत्सम्बन्धिनी बुद्धिका<br>निरास हो जाता है, उसी प्रकार<br>सत्‌का विवेक करके देखनेवालोंके<br>लिये अन्य विकारसम्बन्धी शब्द<br>और बुद्धि निवृत्त हो जाते हैं, जैसा<br>कि “जहाँसे मनके सहित वाणी<br>न पहुँचकर लौट आती है” “जो<br>वाणीका अविषय और अनाश्रय है<br>उसमें” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित<br>होता है ।