छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यद्यत्पूर्वमिह लोके भवन्ति बभू- | ये वही फिर लौटकर हो जाते हैं। |
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| वुरित्यर्थः, तदेव पुनरागत्य | तात्पर्य यह है कि सहस्रों कोटि |
| भवन्ति युगसहस्रकोट्यन्तरि- | युगोंका अन्तर पड़ जानेपर भी |
| तापि संसारिणो जन्तोर्या पुरा | संसारी जीवोंकी जो पूर्वभावित |
| भाविता वासना सा न नश्य- | वासना होती है वह नष्ट नहीं |
| तीत्यर्थः । “यथाप्रज्ञं हि स- | होती । “जन्म पूर्व वासनाके अनुसार |
| म्मवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥३॥ | ही होते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥३॥ |
| बाः प्रजा यस्मिन्प्रविश्य | जिसमें प्रवेश करके वह प्रजा |
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| पुनराविर्भवन्ति ये त्वितोऽन्ये | पुनः आविर्भूत होती है, तथा उनसे |
| सत्यत्यात्माभिसन्धा यमणुभावं | अन्य जो सद्रूप सत्यात्मामें अभि- |
| सदात्मानं प्रविश्य नावर्तन्ते | निवेश रखनेवाले हैं वे जिस अणु- |
| भाव अर्थात् सत्यात्मामें प्रवेश करके फिर नहीं लौटते— |
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥
| स य एषोऽणिमेत्यादि व्या- | 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी |
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| ख्यातम् । तथा लोके स्वकीये | है । [ श्वेतकेतु बोला— ] जिस प्रकार लोकमें अपने घरमें सोया |
| गृहे सुप्त उत्थाय ग्रामान्तरं गतो | हुआ पुरुष उठकर ग्रामान्तरमें |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७
| जानाति स्वगृहादागतोऽस्मी- | जानेपर यह जानता है कि मैं अपने |
| त्येवं सत आगतोऽस्मीति च | घरसे आया हूँ, इसी प्रकार जीवोंको |
| जन्तूनां कस्माद्विज्ञानं न भव- | ऐसा ज्ञान क्यों नहीं होता कि मैं |
| तीति भूय एव मा भगवान्वि- | सत्के पाससे आया हूँ, अतः हे |
| ज्ञापयत्वित्युक्तस्तथा सोम्येति | भगवन् ! मुझे फिर समझाइये । |
| होवाच पिता ॥ ४ ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥४॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा— | इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर।<br>जिस प्रकार— |
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इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मियमहमस्मीति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं जानतीं कि ‘यह मैं हूँ, यह मैं हूँ’ ॥ १ ॥
| सोम्येमा नद्यो गङ्गाद्याः पुरस्तात्पूर्वां दिशं प्रति प्राच्यः प्रागञ्चनाः स्यन्दन्ते स्रवन्ति । पश्चात्प्रतीचीं दिशं प्रति सिन्ध्वाद्याः प्रतीचीमञ्चन्ति गच्छन्तीति प्रतीच्यस्ताः समुद्रादम्भोनिधेर्जलधरैराक्षिप्ताः पुनर्वृष्टिरूपेण पतिता गङ्गादिनदीरूपिण्यः पुनः समुद्रमम्भोनिधिमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति । ता नद्यो यथा तत्र समुद्रे समुद्रात्मनैकतां | हे सोम्य ! ये गङ्गा आदि नदियाँ प्राच्य पूर्ववाहिनी होकर पुरस्तात् पूर्व दिशाकी ही ओर बहती हैं तथा सिन्धु आदि, जो पश्चिमको ओर जाती हैं अतः प्रतीच्य (पश्चिमवाहिनी) हैं, पश्चिम दिशाके प्रति बहती हैं । वे समुद्र—जलनिधिसे मेघोंद्वारा आकृष्ट होकर वृष्टिरूपसे बरसकर गङ्गादिरूपमें फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । जिस प्रकार समुद्रमें समुद्ररूपसे एकताको प्राप्त हुई वे |
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९
| गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गाहमस्मियं यमुनाहमस्मीति च ॥ १ ॥ | नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह मैं गङ्गा हूँ; यह मैं यमुना हूँ' इत्यादि ॥ १ ॥ |
एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे हो फिर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा यस्मात्सति सम्पद्य न विदु- स्तस्मात्सत्त आगम्य न विदुः सत | ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ क्योंकि सत्में लीन होकर [अपना पार्थक्यज्ञान नहीं रहता, इसलिये] उस सत्से |