छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ८०० | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ७ |
| ८०० | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ७ |
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उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं॥ २ ॥
| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति—न पश्यः पश्यतीति। पश्यो यथोक्तदर्शी विद्वानित्यर्थः, मृत्युं मरणं रोगं ज्वरादि दुःखतां दुःखभावं चापि न पश्यति। सर्वं ह सर्वमेव स पश्यः पश्यत्यात्मानमेव सर्वम्। ततः सर्वमाप्नोति सर्वशः सर्वप्रकारैरिति। <br><br> किञ्च स विद्वान्प्राक्सृष्टिप्रभेदादेकधैव च संस्त्रिधादिभेदैरनन्तभेदप्रकारो भवति सृष्टिकाले। पुनः संहारकाले मूलमेव स्वं पारमार्थिकमेकधाभावं प्रतिपद्यते स्वतन्त्र एवेति विद्याफलेन प्ररोचयन्स्तौति। <br><br> अथेदानीं यथोक्ताया विद्यायाः सम्यगवभासकारणं मुखावभासकारणस्तेवादर्शस्य विशुद्धिकारणं | इस विषयमें यह श्लोक—मन्त्र भी है। पश्य नहीं देखता। पश्य अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे देखनेवाला विद्वान् मृत्यु—मरण, ज्वरादि रोग और दुःखत्व यानी दुःखभावको नहीं देखता। वह पश्य—विद्वान् सभीको देखता है अर्थात् सबको आत्मरूप ही देखता है। इसीसे वह सबको सब प्रकार प्राप्त होता है। <br><br> तथा वह विद्वान् सृष्टिभेदके पूर्व एकरूप होता हुआ ही सृष्टिकालमें त्रिधा आदि अनन्तभेद प्रकारोंवाला हो जाता है। और फिर संहारकालमें अपने मूल पारमार्थिक एकधाभावको ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह स्वतन्त्र ही है—इस प्रकार विद्याके फलद्वारा रुचि उत्पन्न करते हुए सनत्कुमारजी उसकी स्तुति करते हैं। <br><br> इसके पश्चात् अब मुखावभासकी हेतुभूत दर्पणकी विशुद्धि करनेके समान उपर्युक्त विद्याके सम्यक् प्रकारसे प्रतिफलित होनेके हेतुभूत साधनका उपदेश किया |
| खण्ड २६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८०१ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| साधनमुपदिश्यते । आहारशुद्धौ । आहियत इत्याहारः शब्दादिविषयविज्ञानं भोक्तुर्भोगायाहियते तस्य विषयोपलब्धिलक्षणस्य विज्ञानस्य शुद्धिराहारशुद्धी रागद्वेषमोहदोषैरसंसृष्टं विषयविज्ञानमित्यर्थः । | जाता है—'आहारशुद्धौ' इत्यादि । जिनका आहरण किया जाय उन्हें 'आहार' कहते हैं; भोक्ताके भोगके लिये शब्दादि विषयविज्ञानका आहरण किया जाता है; उस विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि ही 'आहारशुद्धि' है, अर्थात् राग-द्वेष, मोह आदि दोषोंसे असंसृष्ट विषयविज्ञान । |
| तस्यामाहारशुद्धौ सत्यां तद्वतोऽन्तःकरणस्य सत्त्वस्य शुद्धिनैर्मल्यं भवति, सत्त्वशुद्धौ च सत्यां यथावगते भूमात्मनि ध्रुवाविच्छिन्ना स्मृतिरविस्मरणं भवति । तस्यां च लब्धायां स्मृतिलम्भे सति सर्वेषामविद्याकृतानर्थपाशरूपाणामनेकजन्मान्तरानुभवभावनाकाठिनीकृतानां हृदयाश्रयाणां ग्रन्थीनां विप्रमोक्षो विशेषेण प्रमोक्षणं विनाशो भवतीति । यत एतदुत्तरोत्तरं यथोक्तमाहारशुद्धिमूलं तस्मात्सा कार्येत्यर्थः । | उस आहारशुद्धिके होनेपर उससे युक्त अन्तःकरण यानी सत्त्वकी शुद्धि-निर्मलता होती है; और अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर उपर्युक्त प्रकारसे जाने गये भूमात्मामें ध्रुव—अविच्छिन्न स्मृति यानी अविस्मरण हो जाता है तथा उसकी प्राप्ति होनेपर—स्मृति लब्ध होनेपर अनेक जन्मोंमें अनुभव की हुई भावनाओंसे कठिन की हुई अविद्याकृत अनर्थपाशरूप हृदयस्थित ग्रन्थियोंका विप्रमोक्ष—विशेषरूपसे प्रमोक्षण—विनाश हो जाता है । इस प्रकार क्योंकि यह ऊपर कहा हुआ सब कुछ उत्तरोत्तर आहारशुद्धिमूलक है, इसलिये वह अवश्य करनी चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है । |