छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| ष्टामुपकोसलायेति । तस्मा एवं जाययोक्तोऽपि हा प्रोच्यैवानुक्त्वैव किञ्चित्प्रवासाञ्चक्रे प्रवसितवान् २ | किन्तु, स्त्रीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी, वह उससे कुछ कहे बिना ही बाहर चला गया ॥ २ ॥ |
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स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति। स होवाच बहव इमऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥
उस उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन करता ?’ वह बोला—‘इस मनुष्यमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं जो वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके अनेक विषयोंकी ओर जानेवाली हैं। मैं उन्हीं नानात्यय (बहुमुखी) मानसिक चिन्ताओंसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा’ ॥ ३ ॥
(खेदादुपकोसलस्यानशनम्)
| स होपकोसलो व्याधिना मानसेन दुःखेनानशितुमनशनं कर्तुं दध्रे धृतवान्मनः। तं तूष्णीमग्न्यगारेऽवस्थितमाचार्यजायोवाच हे ब्रह्मचारिन्नशान भुङ्क्ष्व किं नु कस्मान्नु कारणान्नाश्नासीति। <br><br> स होवाच बहवोऽनेकेऽस्मिन्पुरुषेऽकृतार्थे प्राकृते कामा इच्छाः कर्तव्यं प्रति नानात्ययो- | उस उपकोसलने व्याधि—मानसिक दुःखसे अनशन करनेका मनमें निश्चय किया। तब अग्निशालामें चुपचाप बैठे हुए उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘हे ब्रह्मचारिन् ! अशन—भोजन कर, क्यों—किस कारणसे भोजन नहीं करता ?’ <br><br> वह बोला—‘इस अकृतार्थ साधारण पुरुषमें अपने कर्तव्यके प्रति बहुत-सी कामनाएँ—इच्छाएँ रहती हैं, जिन व्याधियों—कर्तव्य- |
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३
| ऽतिगमनं येषां व्याधीनां कर्तव्यचिन्तानां ते नानात्यया व्याधयः कर्तव्यताप्राप्तिनिमित्तानि चित्तदुःखानीत्यर्थः। तैः प्रतिपूर्णोऽस्मि; अतो नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ | सम्बन्धिनी चिन्ताओंके अत्यय—अतिगमन-वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके विषय-प्रवेशके मार्ग नाना हैं ऐसी जो नानात्यय कामनारूप व्याधियाँ अर्थात् कर्तव्यता प्राप्तिनिमित्तक मानसिक दुःख हैं, मैं उनसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा'❊ ॥३॥ |
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| उक्त्वा तूष्णींभूते ब्रह्मचारिणि-- | ब्रह्मचारीके इस प्रकार कहकर चुप हो जानेपर— |
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अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥
फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा—'यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले—'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥४॥
| अथ हाग्नयः शुश्रूषयावर्जिताः<br>अग्नीनां कारुण्याविष्टाः सन्त-<br>तस्मा उपदेष्टुं त्रयोऽपि समूदिरे<br>निश्चयः<br>संभूयोक्तवन्तः । हन्तेदानीमस्मै ब्रह्मचारिणेऽस्मद्भक्ताय दुःखिताय तपस्विने श्रद्दधानाय सर्वेऽनुशास्मोऽनुप्रब्रवाम ब्रह्मविद्यामिति । एवं संप्रधार्य तस्मै होचुरूक्तवन्तः-प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥ | फिर उसकी सेवासे अनुकूल हुए तीनों अग्नियोंने करुणावश, आपसमें मिलकर कहा—'अच्छा अपने अबभक्त इस दुखित, तपस्वी एवं श्रद्धालु ब्रह्मचारीको हम शिक्षा दें---इसे हम ब्रह्मविद्याका उपदेश करें---ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले----'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥ ४ ॥ |
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❊ यद्यपि 'नानात्ययाः' पद 'कामाः' का ही विशेषण है, तथापि भाष्यकारने कामनाओं और व्याधियोंको एक मानकर उसे व्याधिका भी विशेषण बनाया है ।