छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति । अविकलकरणो भवतीत्येतत् । सर्वमायुरेति । “शतं वर्षाणि सर्वमायुः पुरुषस्य” इति श्रुतेः । ज्योगुज्ज्वलं जीवति । महान्भवति प्रजादिभिर्महांश्च कीर्त्या । गायत्रोपासकस्यैतद्व्रतं भवति यन्महामनस्त्वम्, अक्षुद्रचित्तः स्यादित्यर्थः ॥ २ ॥ | वह जो इस प्रकार इस गायत्र-संज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है अर्थात् अविकल इन्द्रियवान् होता है, वह पूर्ण आयुका उपभोग करता है। “पुरुषकी पूर्ण आयु सौ वर्ष है”—ऐसी श्रुति है। ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है; प्रजादिके कारण भी महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। यह जो महामनस्त्व (विशालहृदयता) है, गायत्रोपासकका व्रत है अर्थात् उसे उदारचित्त होना चाहिये ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥११॥
द्वादश खण्ड
रथन्तरसामकी उपासना
अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनꣳसंशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥
अभिमन्थन करता है—यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है—यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है—यह निधन है और सर्वथा शान्त हो जाता है—यह भी निधन है। रथन्तरसाम अग्निमें प्रतिष्ठित है ॥१॥
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८९
| अभिमन्थति स हिंकारः प्राथम्यात् । अग्नेर्धूमो जायते स प्रस्ताव आनन्तर्यात् । ज्वलति स उद्गीथो हविःसंबन्धाच्छ्रैष्ठ्यं ज्वलनस्य । अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारोऽङ्गाराणां प्रतिहृतत्वात् । उपशमः सावशेषत्वाग्नेः संशमो निःशेषोपशमः समाप्तिसामान्यान्निधनम् । एतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्; मन्थने ह्यग्नेर्गीयते ॥ १ ॥ | [ अग्निका ] अभिमन्थन करता है—यह सर्वप्रथम होनेके कारण हिंकार है । अग्निसे जो धुआँ उत्पन्न होता है वह इसका पश्चाद्वर्ती होनेके कारण प्रस्ताव है । अग्नि जलता है—यह उद्गीथ है; हविका सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके प्रज्वलित होनेकी श्रेष्ठता है । अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है, क्योंकि अङ्गारोंका प्रतिहरण किया जाता है। अग्निके बुझनेमें कसर रह जानेके कारण उपशम और उसका सर्वथा शान्त हो जाना संशम रूप निधन हैं, क्योंकि उसके साथ समाप्तिमें इनकी समानता है। यह रथन्तरसाम अग्निमें अनुस्यूत है तथा यह अग्नि-मन्थनकालमें गाया जाता है ॥ १ ॥ |
स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥२॥
वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तरसामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है वह ब्रह्मतेजःसम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है । अग्निकी ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ २ ॥
| स य इत्यादि पूर्ववत् । ब्रह्मवर्चसी वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । ब्रह्मवर्चसी—सदाचार और स्वाध्यायके |