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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७


वह जो कि आशाको 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । जहाँतक आशाकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद— ] 'भगवान् मुझे वह बतलावें' ॥ २ ॥

| यस्त्वाशां ब्रह्मेत्युपास्ते शृणु तस्य फलम् । आशया सदोपासितयास्योपासकस्य सर्वे कामाः समृध्यन्ति समृद्धिं गच्छन्ति । अमोघा हास्याशिषः प्रार्थनाः सर्वा भवन्ति यत्प्रार्थितं सर्वं तदवश्यं भवतीत्यर्थः । यावदाशाया गतमित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ | जो पुरुष आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसका फल श्रवण करो । सर्वदा उपासना की हुई आशासे उसके उपासककी सब कामनाएँ समृद्ध अर्थात् उन्नतिको प्राप्त हो जाती हैं और उसकी सब आशा-प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । तात्पर्य यह है कि जो कुछ उसका प्रार्थित होता है वह अवश्य सिद्ध होता है । 'यावदाशाया गतम्'इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश खण्ड

आशासे प्राणका प्राधान्य

| नामोपक्रममाशान्तं कार्य-कारणत्वेन निमित्तनैमित्तिकत्वेन चोत्तरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृतिनिमित्तसद्भावमाशारशनापाशैर्विपाशितं सर्वं सर्वतो बिसमिव तन्तुभिर्यस्मिन्प्राणे समर्पितम्, येन च सर्वतोव्यापिनान्तर्बहिर्गतेन सूत्रे मणिगणा इव सूत्रेण ग्रथितं विधृतं च स एषः— | नामसे लेकर आशापर्यन्त जो कार्यकारण एवं निमित्त-नैमित्तिक रूपसे उत्तरोत्तर बढ़कर स्थित है तथा जिसका सद्भाव स्मृतिके निमित्त-रूपसे सिद्ध होता है उस आशारूप जालसे तन्तुसे कमलनालके समान सब ओरसे जकड़ा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् जिस प्राणमें समर्पित है तथा बाहर-भीतर व्याप्त हुए जिस सर्वगत सूत्र (प्राण) के द्वारा सूतमें मणियों [मनकों] के समान यह सब गूँथा हुआ और विधृत है। वह यह— |

प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँसमर्पितम्। प्राणःप्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥

प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार इस प्राणमें सारा जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही देता है। प्राण ही पिता है; प्राण