छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति वा स्वेनात्मना जगदिति, दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिः समाहितचेतोभिर्ब्रह्मचर्यादिसाधनापेक्षैः । तेजस्विनोऽपि श्मश्रुकेशादयः कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि— हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश इति । ज्योतिर्मयान्येवास्य श्मश्रूणि केशाश्चेत्यर्थः । आप्रणखात्प्रणखो नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वः सुवर्ण इव भारूप इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | [ ऐसा जो हिरण्मय ] पुरुष, [ शरीररूप ] पुरमें शयन करनेके कारण अथवा अपनेद्वारा सारे जगत्-को पूर्ण करता है इसलिये यह पुरुष कहलाता है, जिनकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं उन समाहित चित्त और ब्रह्मचर्यादि-साधनवान् पुरुषोंको दिखायी देता है—तेजस्वी होनेपर भी उसके दाढ़ी-मूँछ आदि तो काले ही होंगे, अतः श्रुति उसकी विशेषता बतलाती है—जो सुनहली श्मश्रु और सुनहले केशोंवाला है; अर्थात् इसके दाढ़ी-मूँछ और केश भी ज्योतिर्मय ही हैं । तात्पर्य यह है कि यह नख-पर्यन्त अर्थात् नखाग्रसे लेकर सारा-का-सारा सुवर्णके समान प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ६ ॥ |
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥
उसके दोनों नेत्र बन्दरके बैठनेके स्थान (गुदा) के सदृश अरुण वर्णवाले पुण्डरीक (कमल) के समान हैं । उसका 'उत' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर गया हुआ है ! जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ७ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य- | इस प्रकार · सब ओरसे सुवर्ण- |
| वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रोंमें एक | |
| क्ष्णोर्विशेषः । कथम् ? तस्य | विशेषता है । किस प्रकार ? उस |
| देवके, जैसा कि कप्यास होता है | |
| यथा कपेर्मर्कटस्यासः कप्यासः, | उसके सदृश लाल पुण्डरीक (कमल)के |
| समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- | |
| आसेरुपवेशनार्थस्य करणे घञ्, | मर्कट (बंदर) के आसका नाम |
| कप्यास है; उपवेशन (बैठने) अर्थके | |
| कपिपुष्ठान्तो येनोपविशति । | वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घञ्' |
| प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध | |
| कप्यास इव पुण्डरीकमत्यन्त- | होता है । अतः 'कप्यास' का अर्थ |
| वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) | |
| तेजस्वि, एवमस्य देवस्या- | है, जिससे कि वह बैठता है । |
| [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से | |
| क्षिणी । उपमितोपमानत्वान्न | उपमित किया गया है और नेत्रोंको |
| पुण्डरीककी उपमा दी गयी है; इस | |
| हीनोपमा । | प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण |
| यह हीनोपमा नहीं है । | |
| तस्यैवं गुणविशिष्टस्य गौण- | ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत |
| मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम् ? | पुरुषका 'उत' यह गौण नाम है । |
| इसकी गौणता किस-प्रकार है ? | |
| स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् |
| पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः। | पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित |
| अर्थात् ऊपर गया हुआ है, इसलिये | |
| 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि | वह 'उत' नामवाला है । जैसा कि |
| वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत | 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ है' |
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । | |
| इत्यर्थः, अतोऽसावुन्नामा । | ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत' नामवाले |
| तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन | पुरुषको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता |
| प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेवो- | है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण |