छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| वाक्यशेषः । आत्मनोऽमृताभयगुणवत्त्वस्याभिप्रेतत्वात् ।<br><br>द्विरुक्तमपि न्यायतो मया यथावन्नावधारयति; तस्मात्पूर्ववदस्याद्यापि प्रतिबन्धकारणमस्तीति मन्वानस्तत्क्षपणाय वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमित्यादिदेश प्रजापतिः। तथोषितवते क्षपितकल्मषायाह ॥ २-४ ॥ | अभीष्ट है, अतः तुम्हारे अभिप्रायके अनुसार यह बात ऐसी ही है।* यहाँ 'एवमेवैष' इससे आगे 'तवाभिप्रायेण' यह वाक्यशेष है ।<br><br>फिर ऐसा समझकर कि 'मेरे दो बार युक्तिपूर्वक बतलानेपर भी यह ठीक-ठीक नहीं समझता, इसलिये पहलेकी भाँति अब भी इसमें प्रतिबन्धका कारण विद्यमान है'—प्रजापतिने उसकी निवृत्तिके लिये इन्द्रको 'बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो'—ऐसी आज्ञा दी। इस प्रकार ब्रह्मचर्यवास करके क्षीणदोष हुए इन्द्रसे प्रजापतिने कहा ॥ २-४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
* अर्थात् स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें वस्तुतः कोई लाभ नहीं है ।
एकादश खण्ड
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सुषुप्त पुरुषका उपदेश
| पूर्ववदेतं त्वेव त इत्याद्युक्त्वा— | पूर्ववत् ‘मैं तेरे प्रति इसकी [पुनः व्याख्या करूँगा]’ ऐसा कहकर— |
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तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह खल्वयमेवँसम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥
‘जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्-रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है’—ऐसा प्रजापतिने कहा ‘यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।’ यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये; किंतु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—‘उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि ‘यह मैं हूँ’ और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता’ ॥ १ ॥
| तद्यत्रैतत्सुप्त इत्यादि व्याख्यातं वाक्यम्। अक्षिणि यो | ‘तद्यत्रैतत् सुप्तः’ इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले हो चुकी है। ‘जो नेत्रस्थ द्रष्टा स्वप्नमें पूजित होता |
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