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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
६०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
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| ६०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मसृजन्त पृथिवीलक्षणम्। पार्थिवं ह्यन्नं तस्माद्यत्र क्व च वर्षति देशे तत्तत्रैव भूयिष्ठं प्रभूतमन्नं भवति। अतोऽद्द्भ्य एव तदन्नामन्नाद्यमधिजायते। ता अन्नमसृजन्तेति पृथिव्युक्ता पूर्वमिह तु दृष्टान्तेऽन्नं च तदाद्यं चेति विशेषणाद्व्रीहियवाद्या उच्यन्ते। अन्नं च गुरु स्थिरं धारणं कृष्णं च रूपतः प्रसिद्धम्। | रचना की। अन्न पृथिवीका विकार है, इसलिये जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न हो जाता है। अतः वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है। 'उसने अन्नकी रचना की' ऐसा कहकर पहले तो श्रुतिने 'अन्न' शब्दसे पृथिवी कही है और अब दृष्टान्तमें 'वह अन्न और आद्य' ऐसा विशेषण देनेके कारण [ आद्य शब्दसे ] धान, जौ आदि कहे हैं। अन्न भारी, स्थिर, धारण करनेवाला और रूपसे कृष्णवर्ण होता है—ऐसा प्रसिद्ध है ! |
| ननु तेजःप्रभृतिष्वीक्षणं न गम्यते हिंसादिप्रतिषेधाभावात्त्रासादिकार्यानुपलम्भाच्च। तत्र कथं तत्तेज ऐक्षतेत्यादि। | शङ्का—किंतु तेज आदिमें तो ईक्षण होना समझमें नहीं आता; क्योंकि उनमें हिंसादिके प्रतिषेधका अभाव है और त्रास आदि कार्य भी नहीं देखे जाते। फिर श्रुतिने 'तेजने ईक्षण किया' इत्यादि कथन कैसे किया ? |
| नैष दोषः, ईक्षितृकारणपरिणामत्वात्तेजःप्रभृतीनां सत् एवेक्षितृनियतकर्मविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्च तेजःप्रभृतीक्षत इवेक्षत इत्युच्यते भूतम्। | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि तेज आदि भूत ईक्षण करनेवाले कारणके परिणाम हैं। ईक्षण करनेवाला सत् ही नियतक्रमविशिष्ट होकर कार्यका उत्पन्न करनेवाला होनेसे तेज आदि भूतोंने 'मानो ईक्षण किया' ऐसे अर्थमें 'ईक्षण किया' ऐसा कहा जाता है। |
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खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१
| ननु सतोऽप्युपचरितमेवेक्षितृत्वम् । | शङ्का—किंतु सत्का ईक्षण भी तो उपचारसे ही है ? |
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| न; सदीक्षणस्य केवलशब्दगम्यत्वान्न शक्यमुपचरितं कल्पयितुम् । तेजःप्रभृतीनां त्वनुमीयते मुख्येक्षणाभाव इति युक्तमुपचरितं कल्पयितुम् । | समाधान—नहीं, सत्का ईक्षण केवल शब्दगम्य है; इसलिये वह उपचारसे है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। तेज आदिके मुख्य ईक्षणका अभाव तो अनुमानसे सिद्ध है; इसलिये उसे उपचरित मानना ठीक है। |
| ननु सतोऽपि मृद्वत्कारणत्वादचेतनत्वं शक्यमनुमातुम् । अतः प्रधानस्यैवाचेतनस्य सचेतनार्थत्वान्नियतकालक्रमविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्चैक्षतेवैक्षतेति शक्यमनुमातुमुपचरितमेवेक्षणम् । दृष्टश्च लोकेऽचेतने चेतनवदुपचारः । यथा कूलं पिपतिषतीति तद्वत्सतोऽपि स्यात् । | शङ्का—परंतु मृत्तिकाके समान कारण होनेसे सत्के अचेतनत्वका भी अनुमान किया जा सकता है। अतः अचेतन प्रधानरूप जो सत् है वह चेतनके प्रयोजनके लिये है और नियतकालक्रमसे विशिष्ट कार्यका उत्पादक है, इस कारण उसीने ईक्षण करनेके समान ईक्षण किया—इस प्रकार उसका ईक्षण उपचरित ही है, ऐसा अनुमान किया ही जा सकता है। लोकमें अचेतनमें चेतनके समान उपचार होता देखा ही जाता है, जिस प्रकार 'किनारा गिरना चाहता है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार सत्का ईक्षण भी औपचारिक हो सकता है। |
| न; तत्सत्यं स आत्मेति तस्मिन्नात्मोपदेशात् । | समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि, 'वह सत्य है' वह आत्मा है, ऐसा कहकर उसीमें आत्माका उपदेश किया गया है । |