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सर्वकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 978 में से

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पृष्ठ 259

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५५

उपासनानि च कर्माङ्गविषयाणि मधुकृतः । ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् प्रणवाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । मध्वेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव समाहितदृष्टैर्दृश्यते सञ्चलतीव ॥ १-३ ॥विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणवसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। समाहितदृष्टि पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् संचलित-सा होता दिखायी देता है वही मधु है॥१-३॥
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ते वा एते रसानाꣳरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥

वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं—वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥

ते वा एते यथोक्ता रोहितादिरूपविशेषा रसानां रसाः । केषां रसानाम् ? इत्याह—वेदा हि यस्माल्लोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति रसास्तेषां रसानां कर्मभावमापन्नानामप्येते रोहितादिविशेषा रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः ।वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप विशेष ही रसोंके रस हैं। किन रसोंके रस हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—क्योंकि लोकोंके सारभूत होनेके कारण वेद ही सार अर्थात् रस हैं और कर्मभावको प्राप्त हुए उन रसोंके भी वे रोहितादि रूप-विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं।