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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| <div align="center">प्रथम अध्याय</div> | |

श्रीहरिः

विषय-सूची

विषयपृष्ठ
१. शान्तिपाठ२५
<div align="center">प्रथम अध्याय</div>
<div align="center">प्रथम खण्ड</div>
२. सम्बन्ध-भाष्य२६
३. उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना३१
४. उद्गीथका रसतमत्व३३
५. उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय३५
६. ओंकारमें संसृष्ट मिथुनके समागमका फल३९
७. उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना करनेका फल४०
८. ओंकारकी समृद्धिगुणवत्ता४०
९. ओंकारकी स्तुति४२
१०. उद्गीथविद्याके जानने और न जाननेवालेके कर्मका भेद४४
<div align="center">द्वितीय खण्ड</div>
११. प्राणोपासनाकी उत्कृष्टता सूचित करनेवाली आख्यायिका४७
१२. प्राणादिका सदोषत्व४९
१३. मुख्य प्राणद्वारा असुरोंका पराभव५४
१४. प्राणोपासकका महत्त्व५५
१५ प्राणकी आङ्गिरस संज्ञा होनेमें हेतु५९
१६. प्राणकी बृहस्पति संज्ञा होनेमें हेतु६१
१७. प्राणकी आयास्य संज्ञा होनेमें हेतु६१
१८. प्राणदृष्टिसे ओंकारोपासनाका फल६३

( ९ )

तृतीय खण्ड

१९. आदित्यदृष्टिसे उद्गीथोपासना .... .... ६४
२०. सूर्य और प्राणकी समानता तथा प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना .... .... ६५
२१. व्यानदृष्टिसे उद्गीथोपासना .... .... ६७
२२. व्यानप्रयुक्त होनेसे वाक्, ऋक्, साम और उद्गीथकी समानता .... ६९
२३. उद्गीथाक्षरोंमें प्राणादिदृष्टि .... .... ७०
२४. उद्गीथाक्षरोंमें द्युलोकादि तथा सामवेदादि दृष्टि .... .... ७२
२५. सकामोपासनाका क्रम .... .... ७३

चतुर्थ खण्ड

२६ उद्गीथसंज्ञक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका .... .... ७७
२७. ओंकारका उपयोग और महत्त्व .... .... ८०
२८. ओंकारोपासनाका फल .... .... ८१

पञ्चम खण्ड

२९. ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद .... .... ८३
३०. रश्मिदृष्टिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल .... ८४
३१. मुख्य प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना .... ... ८५
३२. प्राणभेददृष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल .... ८६
३३. प्रणव और उद्गीथका अभेद .... ... ८७

षष्ठ खण्ड

३४. अनेक प्रकार की आधिदैविक उद्गीथोपासनाएँ .... ... ८९

सप्तम खण्ड

३५. अध्यात्म-उद्गीथोपासना .... ... ९८
३६. आदित्यान्तर्गत और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंकी एकता .... .... १००
३७. इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फल .... ... १०३

अष्टम खण्ड

३८. उद्गीथोपासनाकी उत्कृष्टता प्रदर्शित करनेके लिये शिलक, दालभ्य और प्रवाहणका संवाद .... .... १०६

नवम खण्ड

३९. शिलककी उक्ति—आकाश ही सबका आश्रय है .... .... ११७
४०. आकाशसंज्ञक उद्गीथकी उत्कृष्टता और उसकी उपासनाका फल .... ११८

दशम खण्ड

४१. उषस्तिका आख्यान ... .... १२२
४२. राजयज्ञमें उषस्ति और ऋत्विजोंका संवाद ... .... १२८

( १० )

एकादश खण्ड

४३. राजा और उषस्तिका संवाद.... ...१३१
४४. उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न.... ....१३३
४५. उषस्तिका उत्तर—प्रस्तावानुगत देवता प्राण है.... ...१३३
४६. उद्गाताका प्रश्न.... ...१३५
४७. उषस्तिका उत्तर—उद्गीथानुगत देवता आदित्य है... ....१३५
४८. प्रतिहर्ताका प्रश्न.... ....१३६
४९. उषस्तिका उत्तर—प्रतिहारानुगत देवता अन्न है... ....१३६

द्वादश खण्ड

५०. शौवसामसम्बन्धी उपाख्यान.... ....१३८
५१. कुत्तोंद्वारा किया हुआ हिंकार.... ....१४२

त्रयोदश खण्ड

५२. सामावयवभूत स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाएँ.... ...१४४
५३. स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल.... ...१४७

द्वितीय अध्याय

प्रथम खण्ड

५४. साधुदृष्टिसे समस्त सामोपासना... ...१४९

द्वितीय खण्ड

५५. लोकविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना... ....१५४
५६. आवृत्तिकालिक अधोमुख लोकोंमें पञ्चविध सामोपासना....१५७

तृतीय खण्ड

५७. वृष्टिविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना.... ...१५९

चतुर्थ खण्ड

५८. जलविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना.... ...१६१

पञ्चम खण्ड

५९. ऋतुविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना... ....१६३

षष्ठ खण्ड

६०. पशुविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना.... ...१६५

सप्तम खण्ड

६१. प्राणविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना... ....१६७

अष्टम खण्ड

६२. वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना... ...१७०

( ११ )

नवम खण्ड
६३. आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपासना .... .... १७३

दशम खण्ड
६४. मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना .... .... १८१

एकादश खण्ड
६५. गायत्रसामकी उपासना .... .... १८७

द्वादश खण्ड
६६. रथन्तरसामकी उपासना .... .... १८९

त्रयोदश खण्ड
६७. वामदेव्यसामकी उपासना ... ... १९१

चतुर्दश खण्ड
६८. बृहत्सामकी उपासना .... .... १९२

पञ्चदश खण्ड
६९. वैरूपसामकी उपासना ... .... १९४

षोडश खण्ड
७०. वैराजसामकी उपासना .... .... १९६

सप्तदश खण्ड
७१. शक्वरीसामकी उपासना .... .... १९८

अष्टादश खण्ड
७२. रेवतीसामकी उपासना .... .... १९९

एकोनविंश खण्ड
७३. यज्ञायज्ञीयसामकी उपासना ... .... २००

विंश खण्ड
७४. राजनसामकी उपासना .... .... २०२

एकविंश खण्ड
७५. सर्वविषयक सामकी उपासना .... ... २०४
७६. सर्वविषयक सामकी उपासनाका उत्कर्ष .... ... २०६

द्वाविंश खण्ड
७७. विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना ... .... २०८
७८. स्तवनके समय ध्यानका प्रकार .... .... २१०
७९. स्वरादि वर्णोंकी देवात्मकता .... .... २१०
८०. वर्णोंके उच्चारणकालमें चिन्तनीय .... .... २१२

( १२ )

त्रयोविंश खण्ड

८१. तीन धर्मस्कन्ध .... ... २१४
८२. त्रयीविद्या और व्याहृतियोंकी उत्पत्ति .... .... २३०
८३. ओंकारकी उत्पत्ति ... .... २३१

चतुर्विंश खण्ड

८४. सवनोंके अधिकारी देवता .... .... २३३
८५. साम आदिको जाननेवाला ही यज्ञ कर सकता है .... ... २३४
८६. प्रातःसवनमें वसुदेवतासम्बन्धी सामगान .... .... २३५
८७. मध्याह्नसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान ... ... २३८
८८. तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान ... २३९

तृतीय अध्याय

प्रथम खण्ड

८९. मधुविद्या .... .... २४२
९०. आदित्यादिमें मधु आदि दृष्टि .... .... २४३
९१. आदित्यकी पूर्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि .... २४४

द्वितीय खण्ड

९२. आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि .... २४९

तृतीय खण्ड

९३. आदित्यकी पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि .... २५१

चतुर्थ खण्ड

९४. आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि ... २५२

पञ्चम खण्ड

९५. आदित्यकी ऊर्ध्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि ... २५४

षष्ठ खण्ड

९६. वसुओंके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना .... ... २५७

सप्तम खण्ड

९७. रुद्रोंके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकी उपासना .... .... २६२

अष्टम खण्ड

९८. आदित्योंके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमृतकी उपासना .... .... २६४

नवम खण्ड

९९. मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुर्थ अमृतकी उपासना .... २६८

दशम खण्ड

१००. साध्योंके जीवनाश्रयभूत पञ्चम अमृतकी उपासना .... .... २७०

( १३ )

एकादश खण्ड

१०१. भोग-क्षयके अनन्तर सबका उपसंहार हो जानेपर आदित्यरूप ब्रह्मकी स्वस्वरूपमें स्थिति .... २७२
१०२. ब्रह्मलोकके विषयमें विद्वान्‌का अनुभव .... २७३
१०३. मधुविद्याका फल .... २७४
१०४. सम्प्रदायपरम्परा .... २७५

द्वादश खण्ड

१०५. गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना .... २७८
१०६. कार्यब्रह्म और शुद्धब्रह्मका भेद .... २८४
१०७. भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद .... २८५

त्रयोदश खण्ड

१०८. हृदयान्तर्गत पूर्वसुषिभूत प्राणकी उपासना .... २८९
१०९. हृदयान्तर्गत दक्षिणसुषिभूत व्यानकी उपासना .... २९१
११०. हृदयान्तर्गत पश्चिमसुषिभूत अपानकी उपासना .... २९३
१११. हृदयान्तर्गत उत्तरसुषिभूत समानकी उपासना .... २९४
११२. हृदयान्तर्गत ऊर्ध्वसुषिभूत उदानकी उपासना .... २९५
११३. उपर्युक्त प्राणादि द्वारपालोंकी उपासनाका फल .... २९६
११४. हृदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना .... २९८
११५. हृदयस्थित परम ज्योतिका अनुमापक लिङ्ग .... २९९

चतुर्दश खण्ड

( शाण्डिल्यविद्या )
११६. सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना .... ३०३
११७. समग्र ब्रह्ममें आरोपित गुण .... ३०६
११८. ब्रह्म छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा है .... ३११
११९. हृदयस्थित ब्रह्म और परब्रह्मकी एकता .... ३१२

पञ्चदश खण्ड

१२०. विराट्कोशोपासना .... ३१६

षोडश खण्ड

१२१. आत्मयज्ञोपासना .... ३२३

सप्तदश खण्ड

१२२. अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना .... ३३०

अष्टादश खण्ड

१२३. मन आदि दृष्टिसे अध्यात्म और आधिदैविक ब्रह्मोपासना .... ३३८