छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| जीर्यति । अथ च भवत्यस्य नामाशिषिषतीति गौणम् । जीर्णेऽन्नेऽशितुमिच्छति सर्वो हि जन्तुः ।<br><br>तत्रापामशितनेतृत्वादशनाया इति नाम प्रसिद्धमित्येतस्मिन्नर्थे । यथा गोनायो गां नयतीति गोनाय इत्युच्यते गोपालः, तथाश्वान्नयतीत्यश्वनायोऽश्वपाल इत्युच्यते, पुरुषनायः पुरुषान्नयतीति राजा सेनापतिर्वा, एवं तत्तदाप आचक्षते लौकिका अशनायेति विसर्जनीयलोपेन ।<br><br>तत्रैवं सत्यङ्गी रसादिभावेन नीतेनाशितेनान्नेन निष्पादितमिदं शरीरं वटकणिकायामिव | उसका भक्षण किया हुआ अन्न पचता है । तत्पश्चात् उसका ‘अशिषिषति’ ऐसा गौण नाम होता है, क्योंकि सभी जीव अन्नके जीर्ण हो जानेपर ही भोजन करनेकी इच्छा करते हैं ।<br><br>अशित (भक्षित अन्न) का नेता (ले जानेवाला) होनेके कारण जलका ‘अशनाया’ ऐसा नाम प्रसिद्ध है । [इस विषयमें यह दृष्टान्त है-] जिस प्रकार ‘गोनायः’ गौको ले जाता है इसलिये ग्वाला ‘गोनायः’ कहा जाता है, तथा अश्वोंको ले जाता है इसलिये अश्वपाल ‘अश्वनायः’ ऐसा कहा जाता है और पुरुषोंको ले जाता है इसलिये राजा या सेनापति ‘पुरुषनायः’ कहलाता है । इसी प्रकार उस समय [अशितको ले जानेके कारण] लौकिक पुरुष जलको ‘अशनाय’ ऐसा विसर्गका लोप करके कहते हैं [अर्थात् ‘अशनायः’ इस पदके विसर्गका लोप करके ‘अशनाय’ ऐसा कहते हैं] ।<br><br>ऐसा होनेपर ही जलद्वारा रसादिभावको प्राप्त हुए अन्नद्वारा निष्पन्न हुआ यह शरीररूप अङ्कुर वटके बीजसे उत्पन्न होनेवाले अङ्कुर- |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
| शुङ्गोऽङ्कुर उत्पतित उद्गतः; तमिमं शुङ्गं कार्यं शरीराख्यं वटादिशुङ्गवदुत्पतितं हे सोम्य विजानीहि । किं तत्र विज्ञेयम् ? इत्युच्यते—शृण्विदं शुङ्गवत्कार्यत्वाच्छरीरं नामूलं मूलरहितं भविष्यति ॥ ३ ॥ | के समान उत्पन्न हुआ है। हे सोम्य ! वटादिके अङ्कुरके समान उत्पन्न हुए उस इस शरीरसंज्ञक शुंग—कार्यको तू जान । उसमें क्या विज्ञेयं है ? सो बतलाया जाता है—सुन, अङ्कुरके समान कार्यरूप होनेके कारण यह शरीर अमूल—कारणरहित नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ |
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| इत्युक्त आह श्वेतकेतुः—<br>यद्येवं समूलमिदं शरीरं वटादिशुङ्गवत्तस्यास्य शरीरस्य क्व मूलं स्याद्भवेदित्येवं पृष्ट आह पिता— | [ आरुणिद्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला 'यदि इस प्रकार वटादिके अङ्कुरके समान यह शरीर समूल है तो इसका मूल कहाँ हो सकता है ? इस प्रकार पूछे जानेपर पिताने कहा— |
तस्य क्व मूलꣳस्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यानेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥
अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ? इसी प्रकार हे सोम्य ! तू अन्नरूप शुंगके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप शुङ्गके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप शुङ्गके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसंधान कर । हे सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥