छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| सर्वपर्यायेष्वेतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतेर्वचनम्। यदि वा प्रजापतिच्छद्मरूपायाः श्रुतेर्वचनं सत्यमेव भवेत्। न च यत्कुतर्कबुद्ध्या मृषा कर्तुं युक्तम्। ततो गुरुतरस्यप्रमाणान्तरस्यानुपपत्तेः। | होनेपर समस्त पर्यायोंमें 'यह अमृत ओर अभय है तथा यही ब्रह्म है' ऐसा प्रजापतिका वचन अथवा प्रजापतिच्छद्मरूपा श्रुतिका वचन भी सत्य ही सिद्ध होता है। उसे कुतर्कबुद्धिसे मिथ्या प्रमाणित करना उचित नहीं है, क्योंकि उस (श्रुतिवाक्य) से उत्कृष्टतर प्रमाण मिलना असम्भव है। |
| ननु प्रत्यक्षं दुःखाद्यप्रियवेत्तृत्वमव्यभिचार्यनुभूयत इति चेन्न; जरादिरहितो जीर्णोऽहं जातोऽहमायुष्मान् गौरः कृष्णो मृत इत्यादिप्रत्यक्षानुभववत्तदुपपत्तेः। सर्वमप्येतत्सत्यमिति चेदस्त्येवैतदेवं दुरवगमं येन देवराजोऽप्युदशरावादिदर्शिताविनाशयुक्तिरपि मुमोहैवात्र विनाशमेवापीतो भवतीति। | यदि कहो कि दुःखादि अप्रियवेत्तृत्व तो निश्चित है और प्रत्यक्ष अनुभव होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'मैं जरादिसे रहित हूँ, जराग्रस्त हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, आयुष्मान् हूँ, गौर हूँ, श्याम हूँ, मरा हुआ हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवोंके समान वह (अप्रियवेत्तृत्व) भी सम्भव हो सकता है। यदि कहो कि यह सब तो सत्य ही है तो वस्तुतः यह बात ऐसी ही दुर्गम है, इसीसे आत्माके अविनाशके सम्बन्धमें उदकपात्रादि युक्ति दिखलानेपर भी देवराजको यह मोह ही रहा कि इस अवस्थामें तो यह विनाशको ही प्राप्त हो जाता है। |
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२१
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तथा विरोचनो महाप्राज्ञः प्राजापत्योऽपि देहमात्रात्मदर्शनो बभूव। तथेन्द्रस्यात्मविनाशभयसागर एव वैनाशिका न्यमज्जन्।<br><br>तथा सांख्या द्रष्टारं देहादिन्यतिरिक्तमवगम्यापि त्यक्तागमप्रमाणत्वान्मृत्युविषय एवान्यत्वदर्शने तस्थुः। तथान्ये काणादादिदर्शनाः कषायरक्तमिव क्षारादिभिर्वस्त्रं नवभिरात्मगुणैर्युक्तमात्मद्रव्यं विशोधयितुं प्रवृत्ताः। तथान्ये कर्मिणो बाह्यविषयापहृतचेतसो वेदप्रमाणा अपि परमार्थसत्यमात्मैकत्वं विनाशमिवेन्द्रवन्मन्यमाना घटीयन्त्रवदारोहावरोहप्रकारैरनिशं बम्भ्रमति किमन्ये क्षुद्रजन्तवो विवेकहीनाः स्वभावत एव बहिर्विषयापहृतचेतसः। | तथा परम बुद्धिमान् और प्रजापतिका पुत्र होनेपर भी विरोचन केवल देहमात्रमें आत्मबुद्धि करनेवाला हुआ। इसी प्रकार वैनाशिक लोग इन्द्रके आत्मविनाशरूप भयके समुद्रमें डूब गये। तथा सांख्यवादी द्रष्टा (आत्मा) को देहादिसे भिन्न जानकर भी शास्त्रप्रमाणको छोड़ देनेके कारण मृत्युके विषयभूत भेददर्शनमें ही पड़े रह गये। एवं अन्य काणादादि मतावलम्बी कषायसे रँगे हुए वस्त्रको क्षारादिसे शुद्ध करनेके समान आत्माके नौ गुणोंसे युक्त आत्मद्रव्यको शुद्ध करनेमें लग गये। तथा दूसरे कर्मकाण्डी लोग बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त होनेके कारण वेदको प्रमाण माननेवाले होनेपर भी इन्द्रके समान परमार्थसत्य आत्मैकत्वको अपना विनाश-सा समझकर घटीयन्त्रके समान ऊपर-नीचे जाते-आते रात-दिन भटकते रहते हैं। फिर जो स्वभावसे ही बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त हैं उन अन्य विवेकहीन क्षुद्र जीवोंकी तो बात ही क्या है! |