छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १
| १३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १ |
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| होत्रस्मार्तकर्ममध्ययनादिषु च, अनुज्ञायास्तत्र तत्र दर्शनात् । कर्ममात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः कर्मणीति । मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ | स्मार्त्त कर्म और अध्ययनादि समस्त कर्मोंमें ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि जहाँ-तहाँ [ अविद्वान्के लिये भी ] कर्मानुष्ठानकी आज्ञा देखी जाती है। अतः यह सिद्ध हुआ कि केवल कर्ममात्रका ज्ञान करनेवालोंका भी कर्ममें अधिकार है ॥ ९ ॥ |
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एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥११॥
इसी प्रकार उसने उद्गातासे भी कहा—'हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा' ॥ १० ॥ इसी प्रकार प्रतिहर्तासे भी कहा—'हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा।' तब वे प्रस्तोता आदि अपने-अपने कर्मोंसे उपरत हो मौन होकर बैठ गये ॥ ११ ॥
| एवमेवोद्गातारं प्रतिहर्तारमुवाचेत्यादि समानमन्यत् । ते प्रस्तोत्रादयः कर्मभ्यः समारता उपरताः सन्तो मूर्धपातभयात्तूष्णीमासांचक्रिरेऽन्यच्चाकुर्वन्तः, अर्थित्वात् ॥ १०-११ ॥ | इसी प्रकार उद्गातासे तथा प्रतिहर्तासे कहा—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है। तब वे प्रस्तोता आदि कर्मसे समारत अर्थात् उपरत हो मस्तक गिर जानेके भयसे चुप होकर बैठ गये और अर्थी होनेके कारण उन्होंने कुछ और नहीं किया ॥ १०-११ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
एकादश खण्ड
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राजा और उषस्तिका संवाद
अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥
तब उससे यजमानने कहा—'मैं आप पूज्य-चरणको जानना चाहता हूँ।' इसपर उसने कहा—'मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥
| अथानन्तरं हैनमुषस्तिं यजमानो राजोवाच । भगवन्तं वै पूजावन्तमहं विविदिषाणि वेदितुमिच्छामीत्युक्त उषस्तिरस्मि चाक्रायणस्तवापि श्रोत्रपथमागतो यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १ ॥ | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा—'मैं भगवान्को—पूजनीयको जानना चाहता हूँ।' ऐसा कहे जानेपर उसने कहा—'यदि तुमने सुना हो तो मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥ |
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स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्विज्यैः पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥ २ ॥
मैंने इन समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान्को खोजा था। श्रीमान्के न मिलनेसे ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंका वरण किया था ॥ २ ॥
| स ह यजमान उवाच—सत्यमेवमहं भगवन्तं बहुगुणमश्रौषं सर्वैश्च ऋत्विक्कर्मभिरात्विज्यैः पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । | उस यजमानने कहा—'यह ठीक ही है, मैंने श्रीमान्को बहुत गुणवान् सुना है। मैंने सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये आपकी खोज |
छा० उ० ५—