छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ७०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| निर्वर्तयितुं शक्या नोत्पन्नेति वा शक्यं वक्तुम्, सर्वोपनिषद्वाक्यानां तत्परतयैवोपक्षयात्। यथाग्निहोत्रादिविधिजनिताग्निहोत्रादिकर्तव्यताबुद्धीनामतथार्थत्वमनुत्पन्नत्वं वा न शक्यते वक्तुं तद्वत्। | होत्रादिकर्त्तव्यता बुद्धिका अतथार्थत्व (अग्निहोत्रपरक न होना) अथवा अनुत्पन्नत्व (उत्पन्न ही न होना) नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार 'तू वह है' इस प्रकार कहे जानेपर 'मैं सत् हूँ' ऐसी प्रमाणवाक्यजनित बुद्धि निवृत्त नहीं की जा सकती और न यही कहा जा सकता है कि वह उत्पन्न ही नहीं हुई, क्योंकि सम्पूर्ण उपनिषद्वाक्योंका पर्यवसान इसी अर्थमें हुआ है। |
| देहादिष्वात्मबुद्धित्वात् न सदात्मविज्ञानम्<br>यत्तूक्तं सदात्मा सन्नात्मानं कथं न जानीयादिति, नासौ दोषः; कार्यकरणसङ्घातव्यतिरिक्तोऽहं जीवः कर्ता भोक्तेत्यपि स्वभावतः प्राणिनां विज्ञानादर्शनात्किमु तस्य सदात्मविज्ञानम्। कथमेवं सदात्मविज्ञानम् ? कथमेवं व्यतिरिक्तविज्ञानेऽसति तेषां कर्तृत्वादिविज्ञानं सम्भवति ? दृश्यते | और ऐसा जो कहा कि 'सत्स्वरूप होनेपर भी वह अपनेको [सद्रूप] क्यों न जानता' सो यह दोष भी नहीं आ सकता; क्योंकि स्वभावतः तो प्राणियोंकी ऐसी बुद्धि भी नहीं देखी जाती कि मैं देह और इन्द्रियोंके संघातसे भिन्न कर्ता-भोक्ता जीव हूँ, फिर उन्हें सदात्म-बुद्धि न हो तो आश्चर्य ही क्या है ! ऐसी अवस्थामें उन्हें सदात्म-बुद्धि होगी भी कैसे ? इस प्रकार जबतक उन्हें देहेन्द्रियादिसे व्यतिरिक्त बुद्धि न हो तबतक कर्तृत्वादिवुद्धिका होना भी कैसे |
खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९
| च। तद्वत्तस्यापि देहादिष्वात्मबुद्धित्वान्न स्यात्सदात्मविज्ञानम्। तस्माद्विकारानृताधिकृतजीवात्मविज्ञाननिवर्तकमेवेदं वाक्यं तत्त्वमसीति सिद्धमिति ॥ ३ ॥ | सम्भव हो सकता है और यही बात देखी भी जाती है। इसी प्रकार उसे देहादिमें आत्मबुद्धि होनेके कारण सदात्मबुद्धि नहीं होती। अतः यह सिद्ध हुआ कि ‘तत्त्वमसि’ यह वाक्य विकाररूप मिथ्या देहादिमें अधिकृत जीवात्मभावकी निवृत्ति करनेवाला ही है ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥
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इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्वि-
वरणे षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ ६ ॥