छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विभूतिं गुणफलं लभते दृष्टम्; य एवं यथोक्तं पूर्णाप्रवर्तिगुणं ब्रह्म वेद जानातीहैव जीवंस्तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | गुणविशिष्ट ब्रह्मको जानता है वह पूर्ण और अप्रवर्तिनी-कभी नष्ट न होनेवाली श्री-विभूति इस दृष्ट गौण फलको प्राप्त करता है । अर्थात् इसी लोकमें यानी जीवित रहते हुए ही तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश खण्ड
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हृदयान्तर्गत पूर्वसुषिभूत प्राणकी उपासना
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ् सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि हैं । इसका जो पूर्वदिशावर्ती सुषि ( छिद्र ) है वह प्राण है; वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है ] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ १ ॥
| तस्य ह वा इत्यादिना गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपासनाङ्गत्वेन द्वारपालादिगुणविधानार्थमारभ्यते । यथा लोके द्वारपाला राज्ञ उपासनेन वशीकृता राजप्राप्त्यर्था भवन्ति तथेहापीति । | इस ‘तस्य ह वा’ इत्यादि खण्डद्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मकी उपासनाके अङ्गरूपसे द्वारपालादि गुणोंका विधान करनेके लिये [ यह उत्तर ग्रन्थ ] आरम्भ किया जाता है । क्योंकि जिस प्रकार लोकमें राजाके द्वारपाल उपासनासे ( भेंट आदि देकर ) अपने अधीन कर लिये जानेपर राजासे भेंट करनेमें उपयोगी होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी [ इन उपासनाङ्गोंका उपयोग होता है ] । |