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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


| सोऽपि मनवे । मनुरिक्ष्वाकाभ्यः प्रजाभ्यः प्रोवाचेति विद्यां स्तौति ब्रह्मादिविशिष्टक्रमागतेति । किं च तद्वैतन्मधुज्ञानमुद्दालकायारुणये पिता ब्रह्मविज्ञानं ज्येष्ठाय पुत्राय प्रोवाच ॥ ४ ॥ | मनुने इक्ष्वाकु आदि प्रजावर्ग (अपनी संतान) को सुनाया—इस प्रकार 'यह विद्या ब्रह्मादिविशिष्ट परम्परासे आयी है' ऐसा कहकर श्रुति इस विद्याकी स्तुति करती है। यही नहीं, यह मधुज्ञान अरुणपुत्र उद्दालकको अर्थात् यह ब्रह्मविज्ञान पिताने अपने ज्येष्ठ पुत्रको सुनाया था ॥४॥ |


इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥

अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे ॥ ५ ॥

| इदं वाव तद्यथोक्तमन्योऽपि ज्येष्ठाय पुत्राय सर्वप्रियार्हाय ब्रह्म प्रब्रूयात् । प्रणाय्याय वा योग्यायान्तेवासिने शिष्याय ॥ ५ ॥ | अतः कोई दूसरा विद्वान् भी यह उपर्युक्त ब्रह्मविज्ञान सबसे प्रिय वस्तुके पात्र अपने ज्येष्ठ पुत्रको ही बतावे, अथवा जो शिष्य सुयोग्य हो उससे कहे॥५॥ |

—: ० :—

नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥

किसी दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७७


दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही बढ़कर है, यही बढ़कर है ॥ ६ ॥

| नान्यस्मै कस्मैचन प्रब्रूयात्ती- <br> र्थद्वयमनुज्ञातमनेकेषां प्राप्तानां <br> तीर्थानामाचार्यादीनाम्। कस्मा- <br> त्पुनस्तीर्थसंकोचनं विद्यायाः <br> कृतम् ? इत्याह-यद्यप्यस्मा <br> आचार्याय इमां कश्चित्पृथिवी- <br> मद्भिः परिगृहीतां समुद्रपरि- <br> वेष्टितां समस्तामपि दद्यात्, यस्या <br> विद्याया निष्क्रयार्थम्, आचार्याय <br> धनस्य पूर्णां संपन्नां भोगोपकर- <br> णैः; नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा- <br> त्ततोऽपि दानादेतदेव यन्मधुवि- <br> द्यादानं भूयो बहुतरफलमित्यर्थः। <br> द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ६ ॥ | किसी औरको इसका उपदेश <br> न करे—ऐसा कहकर श्रुतिने <br> आचार्य (विद्या देकर विद्या सीखने- <br> वाले) आदि अनेक तीर्थों (विद्या- <br> दानके पात्रों) मेंसे केवल दो तीर्थ <br> (ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य) के <br> लिये ही आज्ञा दी है। किंतु इस <br> विद्याके पात्रोंका संकोच क्यों किया <br> गया है ? इसपर श्रुति कहती है— <br> यदि इस विद्याका बदला चुकानेके <br> लिये कोई पुरुष इस आचार्यको <br> जलसे परिगृहीत अर्थात् समुद्रसे <br> घिरी हुई और धनसे परिपूर्ण यानी <br> भोगकी सामग्रियोंसे सम्पन्न यह सारी <br> पृथिवी भी दे तो भी वह इसका बदला <br> नहीं हो सकता ? क्योंकि उस <br> दानसे भी यह मधुविद्याका दान ही <br> बड़ा—अधिक फलवाला है, ऐसा <br> इसका तात्पर्य है। द्विरुक्ति विद्याके <br> आदरके लिये है ॥ ६ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

—:०:—

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द्वादश खण्ड

गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना

यत एवमतिशयफलैषा ब्रह्म-विद्यातः सा प्रकारान्तरेणापि वक्तव्येति गायत्री वा इत्याद्यारभ्यते । गायत्रीद्वारेण चोच्यते, ब्रह्मणः सर्वविशेषरहितस्य नेति नेतीत्यादिविशेषप्रतिषेधगम्यस्य दुर्बोधत्वात्। सत्स्वनेकेषुच्छन्दःसु गायत्र्या एव ब्रह्मज्ञानद्वारतयोपादानं प्राधान्यात् । सोमाहरणादितरच्छन्दोऽक्षराहरणेनेतरच्छन्दो-क्योंकि इस प्रकार ब्रह्मविद्या अतिशय फलवती है इसलिये उसका अन्य प्रकारसे भी वर्णन करना चाहिये; इसीसे 'गायत्री वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। गायत्रीद्वारा भी ब्रह्मका ही निरूपण किया जाता है, क्योंकि 'नेति नेति' इत्यादि प्रकारसे विशेषोंके प्रतिषेध-द्वारा अनुभूत होनेवाला सर्वविशेष-रहित ब्रह्म कठिनतासे समझमें आने-वाला है। अनेकों छन्दोंके रहते हुए भी प्रधानताके कारण गायत्रीका ही ब्रह्मज्ञानके द्वाररूपसे ग्रहण किया जाता है। सोमाहरण^१ करनेसे अन्य छन्दोंके अक्षरोंको लानेसे^२,

१. एक बार सोमाभिलाषी देवताओंने सोम लानेके लिये गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती—इन तीन छन्दोंको नियुक्त किया; परंतु असमर्थ होनेके कारण जगती और त्रिष्टुप्—ये दो छन्द तो मार्गमेंसे ही लौट आये, केवल एक गायत्री छन्द ही सोमके पास जा सका और वही सोमके रक्षकोंको परास्त कर उसे देवताओंके पास लाया। यह कथा ऐतरेय ब्राह्मणमें 'सोमो वै राजाऽमुष्मिल्लोक आसीत्' इस प्रसङ्गमें आयी है।
२. गायत्रीके सिवा जो और छन्द सोम लानेके लिये गये थे वे मार्गमें ही थक जानेके कारण अपने कुछ अक्षर छोड़ आये थे। जगतीके तीन अक्षर और त्रिष्टुपका एक अक्षर—ये मार्गमें रह गये थे। इन्हें लाकर गायत्रीने उनकी पूर्ति की।

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [२७९


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
व्याप्त्या च सर्वसवनव्यापकत्वाच्च यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः। गायत्रीसारत्वाच्च ब्राह्मणस्य, मातरमिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं ततोऽन्यद्गुरुतरं न प्रतिपद्यते यथोक्तं ब्रह्मापीति। तस्यामत्यन्तगौरवस्य प्रसिद्धत्वात्। अतो गायत्रीमुखेनैव ब्रह्मोच्यते—इतर छन्दोंमें व्याप्त^१ रहनेसे और सभी सवनोंमें व्यापक होनेसे^२ यज्ञमें गायत्रीकी प्रधानता है। क्योंकि ब्राह्मणका सार गायत्री ही है, इसलिये उपर्युक्त ब्रह्म भी माताके समान गुरुतरा गायत्री को छोड़कर उससे उत्कृष्टतर किसी अन्य आलम्बनको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें लोकका अत्यन्त गौरव प्रसिद्ध ही है। अतः गायत्रीके द्वारा ही ब्रह्मका निरूपण किया जाता है—

गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदꣳ सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १॥

गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री उनका गान (नामोच्चारण) करती और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्दः। इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किं च स्थावरं जङ्गमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव। तस्याश्छन्दो-'गायत्री वै' इस पद में 'वै' शब्द निश्चयार्थक है। ये समस्त भूत अर्थात् ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं वे सब गायत्री ही हैं। वह (गायत्री) तो केवल छन्दमात्र

पाद-टिप्पणी:

१. उष्णिक् और अनुष्टुप् आदि अन्य छन्दोंके प्रत्येक पादमें क्रमशः ७ और ८ आदि अक्षर होते हैं और गायत्रीके एक पादमें ६ अक्षर होते हैं; इसलिये यह उन छन्दोंमें भी व्याप्त है, क्योंकि अधिक संख्याकी सत्ता न्यून संख्याके बिना नहीं हो सकती।
२. प्रातःसवन गायत्र है, मध्याह्नसवन त्रैष्टुभ है और तृतीय सवन जागत है। अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती ये क्रमशः उनके छन्द हैं। गायत्री त्रिष्टुप् और जगतीमें व्याप्त है; इसलिये वह उन सवनोंमें भी व्यापक है।