छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| स्तनयति स प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात् ॥ १ ॥ | कड़कती है—वही प्रतिहत होने (इधर-उधर फैलने) के कारण प्रतिहार है ॥ १ ॥ |
उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
मेघ जो जल ग्रहण करता है—यह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह [ स्वयं भी ] वर्षा करा लेता है ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| उद्गृह्णाति तन्निधनम्, समाप्तिसामान्यात् । फलमुपासनस्य–वर्षति हास्मै। इच्छाताः। तथा वर्षयति हासत्यामपि वृष्टौ य एतदित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ | [ बादल ] जो जल ग्रहण करता है यह निधन है, क्योंकि समाप्तिमें इन दोनोंकी समानता है [ अर्थात् जलग्रहण और निधन दोनों अन्तिम कार्य हैं ] । अब इस उपासनाका फल बतलाते हैं—उसके इच्छानुसार मेघ वर्षा करता है, तथा वृष्टिके न होनेपर भी वह वर्षा करा लेता है। 'य एतदेवम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
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जलविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
सर्वास्वप्सु पञ्चविधꣳसामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामको उपासना करे। मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है—वह हिंकार है, वह जो बरसता है—वह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती हैं, वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती हैं वह प्रतिहार है और समुद्र निधन है ॥ १ ॥
| भाष्यम् | भाषानुवाद |
|---|---|
| सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामो-<br><br>पासीत । वृष्टिपूर्वकत्वात्सर्वासा-<br><br>मपामानन्तर्यम् । मेघो यत्संप्ल-<br><br>वत एकीभावेनेतरेतरं घनीभवति<br><br>मेघो यदा उन्नतस्तदा संप्लवत<br><br>इत्युच्यते । तदापामारम्भः<br><br>स हिंकारः। यद्वर्षति स प्रस्तावः, | सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकार-<br>के सामकी उपासना करे । सम्पूर्ण<br>जल वृष्टिपूर्वक ही होते हैं इस-<br>लिये वृष्टिविषयक उपासनाके बाद<br>जलविषयक उपासनाका निरूपण<br>किया गया है । मेघ जो संप्लवन<br>करता है अर्थात् परस्पर एक होकर<br>घनीभूत होता है [ ‘संप्लवते’ का<br>‘घनीभूत होता है’ अर्थ इसलिये<br>किया गया है कि ] जब मेघ ऊँचा<br>होता है उस समय वह संप्लवन<br>करता है—ऐसा कहा जाता है ।<br>उस घनीभूत होनेके ही समय<br>जलोंका प्रारम्भ होता है; अतः<br>संप्लवन ही हिंकार है । वह जो |