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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| भवति प्राप्तादिचेतयितृत्वसाम- <br> र्थ्यविरहितो भवति तं निपुणा <br> लौकिका नायमस्ति विद्यमानो- <br> ऽप्यसत्सम एवेत्येनमाहुः । <br><br> यच्चायं किञ्चिच्छास्त्रादि वेद <br> श्रुतवांस्तदप्यस्य वृथैवेति कथ- <br> यन्ति । कस्मात् ? यद्ययं <br> विद्वान् स्यादित्थमैवमचित्तो न <br> स्यात्तस्मादस्य श्रुतमप्यश्रुतमेवे- <br> त्याहुरित्यर्थः । अथालपविदपि <br> यदि चित्तवान्भवति तस्मा <br> एतस्मै तदुक्तार्थग्रहणायैवोतापि <br> शुश्रूषन्ते श्रोतुमिच्छन्ति । तस्माच्च <br> चित्तं ह्येवैषां संकल्पादीनामेका- <br> यनमित्यादि पूर्ववत् ॥ २ ॥ | होकर भी अचित्त अर्थात् प्राप्त विषयादिके यथार्थ स्वरूपको जाननेकी सामर्थ्यसे रहित हो तो निपुण लौकिक पुरुष उसके विषयमें 'यह कुछ नहीं है—विद्यमान होते हुए भी असद्रूप ही है' ऐसा कहने लगते हैं । <br><br> वे यह भी कहते हैं कि 'इसने जो कुछ शास्त्रादि जाने अथवा सुने हैं वे भी इसके लिये व्यर्थ ही हैं। क्यों व्यर्थ हैं ? यदि यह विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त (मूढ़) न होता; अतः तात्पर्य यह है कि इसका श्रवण किया हुआ भी अश्रुत ही है' ऐसा वे कहते हैं । और यदि अल्पवित् होनेपर भी वह चित्तवान् होता है तो उससे उसकी कही हुई बातको ग्रहण करनेके लिये ही वे सुननेकी इच्छा करते हैं । अतः चित्त ही इन संकल्पादि- <br> का एकायन है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २ ॥ |


स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवा-
न्ध्रुवःप्रतिष्ठितान्प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसि-
ध्यति । यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७


यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥३॥

वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है । जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही । [ नारद— ] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥


चित्तानुपचितान्बुद्धिमद्गुणैः<br><br>स चित्तोपासको ध्रुवानित्यादि<br><br>चोक्तार्थम् ॥ ३ ॥चित्त अर्थात् बुद्धियुक्त गुणोंसे उपचित ध्रुवलोकोंको वह चित्तोपासक ध्रुव होकर—इत्यादि अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥ ३ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥

षष्ठ खण्ड

चित्तकी अपेक्षा ध्यानका महत्त्व

ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महतां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है। पृथिवी मानो ध्यान करती है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, द्युलोक मानो ध्यान करता है, जल मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं। अतः जो लोग यहाँ मनुष्योंमें महत्त्व प्राप्त करते हैं वे मानो ध्यानके लाभका ही अंश पाते हैं; किंतु जो क्षुद्र होते हैं वे कलहप्रिय, चुगलखोर और दूसरोंके मुँहपर ही उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं। तथा जो सामर्थ्यवान् हैं वे भी ध्यानके लाभका ही अंश प्राप्त करनेवाले हैं। अतः तुम ध्यानकी उपासना करो ॥ १ ॥

ध्यानं वाव चित्ताद्भूयः ।ध्यानं ही चित्तसे बढ़कर है।
ध्यानं नाम शास्त्रोक्तदेवताद्यालम्बनेष्वचलो भिन्नजातीयैरनन्तरितः प्रत्ययसन्तानः, एकाग्रतेतिदेवता आदि शास्त्रोक्त आलम्बनमें विजातीय वृत्तियोंसे अविच्छिन्न एक ही वृत्तिके प्रवाहका नाम 'ध्यान' है, जिसे 'एकाग्रता' ऐसा

खण्ड ६] शाङ्करभाष्यं ७३९

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शाङ्करभाष्यम्अनुवाद
यमाहुः। दृश्यते च ध्यानस्य माहात्म्यं फलतः, कथम् ? यथा योगी ध्यायन्निश्चलो भवति ध्यानफललाभे। एवं ध्यायतीव निश्चला दृश्यते पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षमित्यादि समानमन्यत् । देवाश्च मनुष्याश्च देवमनुष्या मनुष्या एव वा देवसमा देवमनुष्याः शमादिगुणसम्पन्ना मनुष्या देवस्वरूपं न जहतीत्यर्थः।भी कहते हैं। फलसे भी ध्यानका माहात्म्य देखा ही जाता है। किस प्रकार ?—जिस प्रकार ध्यान करता हुआ योगी ध्यानका फल प्राप्त होनेपर निश्चल हो जाता है इसी प्रकार पृथिवी ध्यान करती हुई-सी निश्चल दिखलायी देती है, तथा अन्तरिक्ष ध्यान करता-सा जान पड़ता है इत्यादि। शेष अर्थ इसी प्रकार समझना चाहिये। देव और मनुष्य देवमनुष्य कहे गये हैं अथवा देवतुल्य मनुष्य ही देवमनुष्य हैं। तात्पर्य यह है कि शमादि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष देवभावका कभी त्याग नहीं करते।
यस्मादेवं विशिष्टं ध्यानं तस्माद्य इह लोके मनुष्याणामेव धनैर्विद्यया गुणैर्वा महत्तां महत्त्वं प्राप्नुवन्ति धनादिमहत्त्वहेतुं लभन्त इत्यर्थः। ध्यानापादांशा इव ध्यानस्यापादनमापादो ध्यानफललाभ इत्येतत्, तस्यांशोऽवयवः कला काचिद्ध्यानफललाभकलावन्त इवैवेत्यर्थः, तेक्योंकि इस प्रकार ध्यान विशिष्ट है, इसलिये मनुष्योंमें भी जो लोग इस लोकमें धन, विद्या अथवा गुणोंके कारण महत्ता—महत्त्व प्राप्त करते हैं अर्थात् महत्त्वके हेतुभूत धनादि प्राप्त करते हैं वे ध्यानापादांशके समान हैं। ध्यानके आपादनका नाम है 'ध्यानापाद' अर्थात् ध्यानके फलकी प्राप्ति उसके एक अंश—अवयव यानी कलासे युक्त होते हैं; तात्पर्य यह है कि वे मानो ध्यानफलके आंशिक लाभसे

छा० उ० २४—