छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| तस्मादिदं त्यक्तसर्वबाह्यैषणैरनन्यशरणैः परमहंसपरिव्राजकैरत्याश्रमिभिर्वेदान्तविज्ञानपरैरेव वेदनीयं पूज्यतमैः प्राजापत्यं चेमं सम्प्रदायमनुसरद्भिरुपनिबद्धं प्रकरणचतुष्टयेन। तथानुशासत्यद्यापि त एव नान्य इति ॥ १ ॥ | अतः जिन्होंने सम्पूर्ण बाह्य एषणाओंका त्याग कर दिया है, जिनकी कोई और गति नहीं है और जो प्रजापतिके सम्प्रदायका अनुसरण करनेवाले हैं उन वेदान्तविज्ञानपरायण अत्याश्रमी पूज्यतम परमहंस परिव्राजकोंके द्वारा ही यह चार प्रकरणोंमें उपनिबद्ध (प्रतिपादित) आत्मतत्त्व ज्ञातव्य है; तथा आज भी वे ही उसका उपदेश करते हैं, और कोई नहीं ॥ १ ॥ |
| तत्राशरीरस्य सम्प्रसादस्याविद्यया शरीरेणाविशेषतां सशरीरतामेव सम्प्राप्तस्य शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेण यथाभिनिष्पत्तिस्तथा वक्तव्येति दृष्टान्त उच्यते— | ऐसी अवस्था में, जिस प्रकार अविद्यावश शरीरके साथ अविशेषता अर्थात् सशरीरताको ही प्राप्त हुए अशरीर सम्प्रसादकी शरीरसे उत्थान कर अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है वह बतलानी चाहिये—इसीसे यह दृष्टान्त कहा जाता है— |
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥
वायु अशरीर है; अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि ये सब अशरीर हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे समुत्थान कर सूर्यकी परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अशरीरो वायुरविद्यमानं शिरःपाण्यादिमच्छरीरमस्येत्यशरीरः। किं चाभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरित्येतानि चाशरीराणि। तत्तत्रैवं सति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा अमुष्मादिति भूमिष्ठा श्रुतिर्द्युलोकसम्बन्धनमाकाशदेशं व्यपदिशति। एतानि यथोक्तान्याकाशसमानरूपतामापन्नानि स्वेन वाय्वादिरूपेणागृह्यमाणान्याकाशाख्यतां गतानि। | वायु अशरीर है, इसके शिर एवं हाथ-पाँववाला शरीर नहीं है इसलिये यह अशरीर है। तथा बादल, बिजली और मेघध्वनि—ये भी अशरीर हैं। ऐसा होनेपर भी, जिस प्रकार वर्षादि प्रयोजनकी पूर्ति होनेपर ये उस [ आकाशसे समुत्थान कर ] इस प्रकार भूमिमें स्थित श्रुति द्युलोकसम्बन्धी आकाशका परोक्षरूपसे निर्देश करती है। ये पूर्वोक्त वायु आदि आकाशकी समानरूपताको प्राप्त हो अपने वायु आदि रूपसे गृहीत न होते हुए आकाशसंज्ञाको प्राप्त हो जाते हैं। |
| यथा सम्प्रसादोऽविद्यावस्थायां शरीरात्मभावमेवापन्नस्तानि च तथाभूतान्यमुष्माद्द्युलोकसम्बन्धिन आकाशदेशात्समुत्तिष्ठन्ति वर्षणादिप्रयोजनाभिनिवृत्तये। | जिस प्रकार सम्प्रसाद अविद्यावस्थामें देहात्मभावको ही प्राप्त रहता है उसी प्रकार तद्रूपताको प्राप्त हुए वे सब वर्षा आदि प्रयोजनकी पूर्तिके लिये इस द्युलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे समुत्थान करते हैं। |
| कथम् ? शिशिरापाये सावित्रं परं ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रैष्मकमुपसम्पद्य सावित्रमभितापं प्राप्येत्यर्थः। | किस प्रकार समुत्थान करते हैं?—शिशिरका अन्त होनेपर सूर्यके परम तेज ग्रीष्मकालीन प्रकृष्ट तेजको उपसम्पन्न हो अर्थात् सविताके अभितापको प्राप्त हो |
| आदित्याभितापेन पृथग्भावमा- | उस आदित्यके अभितापको प्राप्त हो उस आदित्यके |