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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| दितिहासपुराणं पञ्चमं वेदं वेदानां भारतपञ्चमानां वेदं व्याकरणमित्यर्थः । व्याकरणेन हि पदादिविभागश ऋग्वेदादयो ज्ञायन्ते; पित्र्यं श्राद्धकल्पम्; राशिं गणितम्; दैवमुत्पातज्ञानम्; निधिं महाकालादिनिधिशास्त्रम्; वाकोवाक्यं तर्कशास्त्रम्; एकायनं नीतिशास्त्रम्; देवविद्यां निरुक्तम्; ब्रह्मण ऋग्यजुःसामारूख्यस्य विद्यां ब्रह्मविद्यां शिक्षाकल्पच्छन्दश्चितयः; भूतविद्यां भूततन्त्रम्; क्षत्रविद्यां धनुर्वेदम्; नक्षत्रविद्यां ज्योतिषम्; सर्पदेवजनविद्यां सर्पविद्यां गारुडं देवजनविद्यां गन्धयुक्तिनृत्यगीतवाद्यशिल्पादिविज्ञानानि । एतत्सर्वं हे भगवोऽध्येमि ॥२॥ | सामवेद और चौथा आथर्वण वेद जानता हूँ, 'वेद' शब्द प्रसंगतः प्राप्त होनेके कारण इतिहासपुराणरूप पाँचवाँ वेद, महाभारतसहित पाँचों वेदोंका वेद अर्थात् व्याकरण—क्योंकि व्याकरणके द्वारा ही पदादिके विभागपूर्वक ऋग्वेदादिका ज्ञान होता है, पित्र्य—श्राद्धकल्प, राशि—गणित, दैव—उत्पातज्ञान, निधि—महाकालादिनिधिशास्त्र, वाकोवाक्य—तर्कशास्त्र, एकायन—नीतिशास्त्र, देवविद्या—निरुक्त, ब्रह्मविद्या—ब्रह्म अर्थात् ऋग्यजुःसामसंज्ञक वेदोंकी विद्या यानी शिक्षा, कल्प, छन्द और चिति, भूतविद्या—भूतशास्त्र, क्षत्रविद्या—धनुर्वेद, नक्षत्रविद्या—ज्योतिष, सर्पदेवजनविद्या अर्थात् सर्पविद्या—गारुड और देवजनविद्या—गन्धयुक्ति तथा नृत्य, गान, वाद्य और शिल्पादि विज्ञान—ये सब हे भगवन् ! मैं जानता हूँ ॥२॥ |

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सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतꣳ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७१५
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भगवःशोचामि तं मा भगवान्छोकस्य पारं तारयत्विति तꣳहोवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥

हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ । मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, और हे भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये । तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है' ॥ ३ ॥

| सोऽहं भगव एतत्सर्वं जानन्नपि मन्त्रविदेवास्मि शब्दार्थमात्रविज्ञानवानेवास्मीत्यर्थः । सर्वो हि शब्दोऽभिधानमात्रमभिधानं च सर्वं मन्त्रेष्वन्तर्भवति । मन्त्रविदेवास्मि मन्त्रवित्कर्मविदित्यर्थः । 'मन्त्रेषु कर्माणि' इति हि वक्ष्यति; नात्मानं वेद्मि । | हे भगवन् ! वह मैं यह सब जानते हुए भी केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ अर्थात् केवल शब्दार्थमात्र जाननेवाला हूँ; क्योंकि सारे शब्द अभिधानमात्र हैं और सम्पूर्ण अभिधान मन्त्रोंके अन्तर्गत हैं । मैं मन्त्रवित् ही हूँ, मन्त्रवित् अर्थात् कर्मवित्, क्योंकि 'मन्त्रोंमें कर्म [ एकरूप होते हैं ]' ऐसा आगे ( खं० ४ मं० १ में ) कहेंगे । मैं आत्माको नहीं जानता । |
| नन्वात्मापि मन्त्रैः प्रकाश्यत एवेति कथं मन्त्रविच्चेन्नात्मवित् । | शङ्का—किंतु आत्मा भी तो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित होता ही है; फिर नारदजी मन्त्रवित् होनेपर भी आत्मवेत्ता क्यों नहीं हैं ? |
| न; अभिधानाभिधेयभेदस्य विकारत्वात् । न च विकार आ- | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि नाम-नामीरूप जो भेद है, वह तो विकार है और विकार |