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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| “प्राणस्य प्राणम्” (बृ०उ० ४।४।१८) “प्राणशरीरो भारूपः” (छा० उ० ३।१४।२) इत्यादिश्रुतेः। अतस्तां देवतां प्राणं प्राणाख्यामेवोपश्रयते। प्राणो बन्धनं यस्य मनसस्तत्प्राणबन्धनं हि यस्मात्सोम्य मनः प्राणोपलक्षितदेवताश्रयम्, मन इति तदुपलक्षितो जीव इति ॥ २ ॥ | ‘प्राण’ कहा गया है, जैसा कि “उस प्राणके प्राणको [ जो जानते हैं ]” “वह प्राणशरीर और प्रकाशस्वरूप है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है; अतः उस प्राण अर्थात् प्राणाख्य देवताको ही आश्रय करता है; क्योंकि हे सोम्य ! प्राण जिसका बन्धन है वह मन प्राणबन्धन है; तात्पर्य यह है कि मन यानी उससे उपलक्षित होनेवाला जीव प्राणोपलक्षित देवताके ही आश्रित है॥२॥ |


—: ० :—

| एवं स्वपितिनामप्रसिद्धिद्वारेण यज्जीवस्य सत्यस्वरूपं जगतो मूलम्, तत्पुत्रस्य दर्शयित्वाथान्नादिकार्यकारणपरम्परयापि जगतो मूलं सद्दिदर्शयिषुः— | इस प्रकार ‘स्वपिति’ इस नामकी प्रसिद्धिद्वारा जीवका जो सत्यस्वरूप जगत्का मूल है उसे पुत्रको दिखलाकर अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे भी जगत्के मूलभूत सत्को दिखानेकी इच्छासे आरुणिने कहा— |

अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमूत्पतितꣳ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥

खण्ड ८ ]शाङ्करभाष्यार्थ६४९

'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा अशना ( भूख ) और पिपासा ( प्यास ) को जान । जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' ( खाना चाहता है ) ऐसे नामवाला होता है, उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्नको ले जाता है ? जिस प्रकार लोकमें [गौ ले जानेवालेको] गोनाय, [ अश्व ले जानेवालेको ] अश्वनाय और [ पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं। उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शुङ्ग ( अङ्कुर ) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल ( कारण-रहित ) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यभाषार्थ
अशनापिपासे अशितुमिच्छाशना, यालोपेन; पातुमिच्छा पिपासा ते अशनापिपासे अशनापिपासयोः सतत्त्वं विजानीहीत्येतत् । यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पुरुषो भवति, किं तत् ? अशिशिषत्यशितुमिच्छतीति तदा तस्य पुरुषस्य किंनिमित्तं नाम भवति ? इत्याह—यत्तत्पुरुषेणाशितमन्नं कठिनं पीता आपो नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन विपरिणमयन्ते, तदा भुक्तमन्नंअशनापिपासे—अशन ( भक्षण ) की इच्छाको 'अशना' कहते हैं, 'या' का लोप करनेसे अशना शब्द बनता है [ वस्तुतः यह 'अशनाया' शब्द है ] और पीनेकी इच्छा 'पिपासा' कहलाती है। ये ही अशना-पिपासा हैं; इन अशना-पिपासाका तत्त्व तू जान ले—ऐसा इसका तात्पर्य है। जब अर्थात् जिस समय यह पुरुष इस नामवाला होता है, किस नामवाला ?—'अशिशिषति' अर्थात् खाना चाहता है; उस समय पुरुषका यह नाम किस कारणसे होता है ? सो बतलाते हैं—उस पुरुषद्वारा खाया हुआ जो कठिन अन्न होता है उसे उसका पीया हुआ जल द्रवीभूत करके ले जाता है अर्थात् रसादि-रूपसे परिणत कर देता है । तभी