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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

१४० छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

१४० छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमे-
त्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥२॥

उसके समीप एक श्वेत कुत्ता प्रकट हुआ। उसके पास दूसरे कुत्तों ने आकर कहा—'भगवन् ! आप हमारे लिये अन्न का आगान कीजिये, हम निश्चय ही भूखे हैं' ॥ २ ॥

| स्वाध्यायेन तोषिता देवत-<br>र्षिर्वा श्वरूपं गृहीत्वा श्वा श्वेतः<br>संस्तस्मा ऋषये तदनुग्रहार्थं<br>प्रादुर्बभूव प्रादुश्चकार । तमन्ये<br>शुक्लं श्वानं क्षुल्लकाः श्वान उप-<br>समेत्योचुरक्तवन्तोऽन्नं नाऽस्मभ्यं<br>भगवानागायत्वागानेन निष्पा-<br>दयत्वित्यर्थः । | स्वाध्यायसे संतुष्ट हो उस<br>ऋषिके निमित्त—उसपर अनुग्रह<br>करनेके लिये [ कोई ] देवता या<br>ऋषि श्वानरूप धारणकर श्वेत कुत्ता<br>बनकर प्रकट हुआ। उस श्वेत कुत्तेसे<br>दूसरे छोटे-छोटे कुत्तों ने समीप<br>आकर कहा—'भगवन् ! आप हमारे<br>लिये अन्नका आगान कीजिये अर्थात्<br>आगानके द्वारा अन्न प्रस्तुत कीजिये।' |
| मुख्यप्राणं वागादयो वा<br>प्राणमन्वन्नभुजःस्वाध्यायपरि-<br>तोषिताः सन्तोऽनुगृह्णीयूरेनं<br>श्वरूपमादायेति युक्तमेवं प्रतिप-<br>त्तुम् । अशनायाम वै बुभुक्षिताः<br>स्मो वा इति ॥ २ ॥ | अथवा मुख्य प्राणसे वागादि<br>गौण प्राणोंने इस तरह कहा, क्योंकि<br>मुख्य प्राणके पीछे अन्न ग्रहण<br>करनेवाले वागादि गौण प्राण उसके<br>स्वाध्यायसे संतुष्ट हो श्वानरूप<br>धारणकर उसपर अनुग्रह करें—<br>ऐसा मानना उचित ही है। 'अवश्य<br>ही हमें अशन (भोजन) की इच्छा है<br>अर्थात् हम निश्चय ही भूखे हैं' ॥२॥ |

तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ॥ ३ ॥

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्याथ १४१


उनसे उस (श्वेत श्वान) ने कहा—'तुम प्रातःकाल यहीं मेरे पास आना।' तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव उनकी प्रतीक्षा करता रहा ॥ ३ ॥

| एवमुक्ते श्वा श्वेत उवाच तान्क्षुल्लकाञ्श्वन इहैवास्मिन्नेव देशे मा मां प्रातः प्रातःकाल उपसमीयातेति । दैर्घ्यं छान्दसं समीयातेति प्रमादपाठो वा । प्रातःकालकरणं तत्काल एव कर्तव्यार्थम् । अन्नदस्य वा सवितुरपराह्णेऽनाभिमुख्यात् ।<br><br>तत्तत्रैव ह बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपालयाञ्चकार प्रतीक्षणं कृतवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | ऐसा कहे जानेपर श्वेत कुत्तेने उन छोटे-छोटे कुत्तोंसे कहा—तुम प्रातःकाल इसी स्थानपर मेरे पास आना। 'समीयात' इस क्रियापदमें दीर्घपाठ छान्दस है अथवा प्रमादके कारण है। प्रातःकालकी जो नियुक्ति की गयी है वह उसी समय उद्गानकी कर्तव्यता सूचित करनेके लिये अथवा मध्याह्नोत्तर कालमें अन्नदाता सूर्य उद्गाताके सम्मुख नहीं रहता—यह सूचित करनेके लिये है।<br><br>तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव नामक ऋषि उसी स्थानपर 'प्रतिपालयाञ्चकार'–प्रतीक्षा करता रहा–यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ |

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ते ह यथैवेह बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सँरब्धाःसर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः॥४॥

उन कुत्तोंने, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करनेवाले उद्गाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं उसी प्रकार भ्रमण किया और फिर वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥ ४ ॥