छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स आचार्यो ब्रूयात्तन्मतिमपनयन् । कथम् ? अस्य देहस्य जरयैतद्यथोक्तमन्तराकाशाख्यं ब्रह्म यस्मिन् सर्वं समाहितं न जीर्यति देहवन्न विक्रियत इत्यर्थः। न चास्य वधेन शस्त्रादिघातेनैतद्धन्यते यथाकाशम्; किमु ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दमस्पर्शं ब्रह्म देहेन्द्रियादिदोषैर्नस्पृश्यत इत्यर्थः । <br><br> कथं देहेन्द्रियादिदोषैर्न स्पृश्यत इत्येतस्मिन्नवसरे वक्तव्यं प्राप्तं तत्प्रकृतव्यासङ्गो मा भूदिति नोच्यते । इन्द्रविरोचनाख्यायिकायामुपरिष्टाद्वक्ष्यामो युक्तितः । <br><br> एतत्सत्यमवितथं ब्रह्मपुरं <br> ब्रह्मैव ब्रह्म-पुरम् । ब्रह्मैव पुरं ब्रह्मपुरं शरीराख्यं तु ब्रह्म- | उस आचार्यको उनकी [ शून्य-विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति करते हुए इस प्रकार कहना चाहिये । किस प्रकार कहना चाहिये ?— इस देहकी जरावस्थासे यह उपर्युक्त अन्तराकाशसंज्ञक ब्रह्म, जिसमें कि सब कुछ स्थित है जीर्ण नहीं होता, अर्थात् देहके समान उसका विकार नहीं होता, और न इसके वध अर्थात् शस्त्रादिके प्रहारसे यह नष्ट ही होता है, जैसे कि [ शस्त्रादिके आघातसे ] आकाशका नाश नहीं होता; फिर उससे भी सूक्ष्मतर अशब्द एवं अस्पर्श ब्रह्मको देह एवं इन्द्रियादिके दोषसे स्पर्श नहीं होता—इस विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका तात्पर्य है । <br><br> देह एवं इन्द्रियादिके दोषोंसे ब्रह्मका स्पर्श क्यों नहीं होता ? इस बातका उल्लेख करना इस अवसरपर आवश्यक है; परंतु प्रसङ्गका विच्छेद न हो, इसलिये यहाँ नहीं कहा जाता । आगे इन्द्र-विरोचनकी आख्यायिकामें इसका युक्तिपूर्वक वर्णन करेंगे । <br><br> यह ब्रह्मपुर सत्य—अवितथ है । ब्रह्म ही पुर [अर्थात् ब्रह्मरूप पुरका नाम ] ब्रह्मपुर है । किंतु यह |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५
| पुरं ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वात्। तच्चानृतमेव, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः। तद्विकारेऽनृतेऽपि देहशृङ्गे ब्रह्मोपलक्ष्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्तं व्यावहारिकम्। सत्यं तु ब्रह्मपुरमेतदेव ब्रह्म; सर्वव्यवहारास्पदत्वात्। अतोऽस्मिन्पुण्डरीकोपलक्षिते ब्रह्मपुरे सर्वे कामा ये बहिर्भवद्भिः प्रार्थ्यन्ते तेऽस्मिन्नेव स्वात्मनि समाहिताः। अतस्तत्प्राप्त्युपायमेवानुतिष्ठत बाह्यविषयतृष्णां त्यजतेत्यभिप्रायः। | शरीरसंज्ञक ब्रह्मपुर ब्रह्मके उपलक्षणके लिये होनेके कारण [ ब्रह्मपुर कहा जाता ] है। और वह तो मिथ्या ही है, क्योंकि “वाणीके आश्रित विकार नाममात्र है” ऐसी श्रुति है। ब्रह्मका विकार और मिथ्या होनेपर भी इस देहरूप अङ्कुर—कार्यमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये इसे व्यावहारिक ब्रह्मपुर कहा गया है। वास्तविक ब्रह्मपुर तो यह ब्रह्म ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रय है। अतः इस हृदयपुण्डरीकोपलक्षित ब्रह्मपुरमें सम्पूर्ण कामनाएँ जिन्हें कि आप बाहर पाना चाहते हैं। वे सब-की-सब इस अपने आत्मामें ही स्थित हैं। इसलिये आपको उसकी प्राप्तिके उपायका ही अनुष्ठान करना चाहिये और बाह्य विषयोंकी तृष्णाका परित्याग कर देना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| एष आत्मा भवतां स्वरूपम्। आत्मनो लक्षणम्। शृणुत तस्य लक्षणम्। अपहतपाप्मा, अपहतः पाप्मा धर्माधर्माख्यो यस्य सोऽयमपहतपाप्मा। तथा विजरो विगतजरो विमृत्युश्च। | यह आत्मा आपका स्वरूप है। आप उसका लक्षण सुनिये। अपहतपाप्मा—जिसका धर्माधर्मसंज्ञक पाप अपहत—नष्ट हो गया है वह यह ब्रह्म अपहतपाप्मा है। इसी प्रकार विजर—जिसकी जरावस्था बीत गयी है और मृत्युहीन है। |