छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| गुणवत्त्वमोंकारस्य सिद्धमित्य- | सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे |
| अभिप्रायः ॥ ६ ॥ | युक्त होना सिद्ध होता है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ |
उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना करनेका फल
| तदुपासकोऽप्युद्गाता तद्धर्मा भवतीत्याह— | उस (ओंकार) का उपासक उद्गाता भी उसीके समान धर्मसे युक्त होता है, यह बतलाया जाता है- |
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आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥
जो विद्वान् (उपासक) इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥७॥
| आपयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति । य एतदक्षरमेवमाप्तिगुणवदुद्गीथमुपास्ते तस्यैतद्यथोक्तं फलमित्यर्थः । "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" (मं० ब्रा० २०) इति श्रुतेः॥७॥ | यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करा देनेवाला होता है। तात्पर्य यह है कि जो इस प्रकार इस आप्तिगुणवान् अक्षर उद्गीथकी उपासना करता है उसे यह पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है, जैसा कि "उसकी जिस-जिस प्रकार उपासना करता है वैसा ही हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ७ ॥ |
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ओंकारकी समृद्धिगुणवत्ता
| समृद्धिगुणवांश्चोंकारः, कथम् | ओंकार समृद्धि गुणवाला भी है, सो किस प्रकार ? |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किं चानुजानात्योमि-
त्येव तदाहं एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा । समर्धयिता
ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथ-
मुपास्ते ॥ ८ ॥
वह यह ओंकार ही अनुज्ञा (अनुमतिसूचक) अक्षर है। [मनुष्य] किसीको जो कुछ अनुमति देता है तो 'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहता है। यह अनुज्ञा ही समृद्धि है। जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंको समृद्ध करनेवाला होता है ॥ ८ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
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| तद्वा एतत्प्रकृतमनुज्ञाक्षरम-<br><br>नुज्ञा च साक्षरं च तत् । अनुज्ञा<br><br>चानुमतिरोङ्कार इत्यर्थः । कथ-<br>मनुज्ञा? इत्याह श्रुतिरेव—यद्धि<br>किं च यत्किं च लोके ज्ञानं धनं<br>वानुजानाति विद्वान्धनी वा<br>तत्रानुमतिं कुर्वन्नोमित्येव तदाह।<br><br>तथा च वेदे—"त्रयस्त्रिंशदित्यो-<br>मिति होवाच" (बृ० उ० ३ ।<br>९ । १) इत्यादि । तथा च<br>लोकेऽपि तवेदं धनं गृह्णामीत्युक्त<br>ओमित्येवाह ! | वह यह ओंकार ही, जिसका प्रक-<br>रण चल रहा है, अनुज्ञाक्षर है। जो<br>अनुज्ञा हो और अक्षर भी हो उसे<br>अनुज्ञाक्षर कहते हैं। अनुज्ञा अनुमति-<br>का नाम है, अर्थात् ॐकार अनुज्ञा<br>है। वह अनुज्ञा किस प्रकार है ?<br>सो स्वयं श्रुति ही बतलाती है—<br>लोकमें कोई विद्वान् या धनी पुरुष<br>जिस किसी ज्ञान अथवा धनके लिये<br>अनुमति देता है तो उस सम्बन्धमें<br>अपनी अनुमति देते हुए वह 'ॐ'<br>ऐसा ही कहता है। तथा वेदमें भी<br>"तैंतीस ऐसा कहनेपर [शाकल्यने]<br>'ॐ' ऐसा कहा" * इत्यादि उदा-<br>हरण हैं और लोकमें भी 'मैं तेरा<br>यह धन लेता हूँ' ऐसा कहनेपर<br>'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहते हैं। |
* शाकल्यनामक एक ब्राह्मणने याज्ञवल्क्यसे पूछा कि कितने देवता हैं ? उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'तैंतीस' । तब शाकल्यने 'ॐ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति प्रकट की । (बृहदारण्यकोपनिषद्)