छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥
उसने पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! क्या बोलूँ ?' [पिताने कहा—] हे सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो—तब उसने कहा—'भगवन् ! मुझे उनका प्रतिभान (स्फुरण) नहीं होता' ॥ २ ॥
| स हैवं श्रुत्वा मनसोऽन्नमयत्वं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छन्पञ्चदशाहानि नाशाशनं न कृतवान् । अथ षोडशेऽहनि हैनं पितरमुपससादोपगतवानुपगम्य चोवाच-किं ब्रवीमि भो इति । इतर आह—ऋचः सोम्य यजूंषि सामान्यधीष्वेति । एवमुक्तः पित्राह-न वै मा मामृगादीनि प्रतिभान्ति मम मनसि न दृश्यन्त इत्यर्थो हे भो भगवन्निति ॥ २ ॥ | उसने ऐसा सुनकर मनकी अन्नमयताको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । फिर सोलहवें दिन वह अपने पिताके पास आया और आकर बोला—'पिताजी ! क्या बोलूँ ?' इसपर पिताने कहा—'हे सोम्य ! ऋक्, यजुः तथा सामवेदके मन्त्रोंका पाठ करो ।' पिताके इस प्रकार कहनेपर वह बोला—'हे भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता; तात्पर्य यह है कि मेरे मनमें उनकी प्रतीति नहीं होती' ॥ २ ॥ |
| एवमुक्तवन्तं पित्राह—शृणु तत्र कारणं येन ते तान्यृगादीनि न प्रतिभान्तीति । | इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे पिताने कहा--'इस सम्बन्धमें तू कारण सुन, जिससे कि तुझे उन ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता ।' |
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५
तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवꣳसोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥
वह उससे बोला—'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषानुवाद |
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| तं होवाच यथा लोके हे सोम्य महतो महत्परिमाणस्याभ्याहितस्योपचितस्येन्धनैरग्नेरेकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः खद्योतपरिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽवशिष्टः स्याद्भवेत्, तेनाङ्गारेण ततोऽपि तत्परिमाणादीषदपि न बहु दहेत्; एवमेव खलु सोम्य ते तवान्नोपचितानां षोडशानां कलानामेका कलावयवोऽतिशिष्टावशिष्टा स्यात्, तया त्वं खद्योतमात्राङ्गारतुल्ययैतर्हीदानीं वेदान्नानुभवसि न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम | उससे आरुणिने कहा—'हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार ईंधनसे आधान किये हुए—बढ़ाये हुए बहुत बड़े परिमाणवाले अग्निका, उसके शान्त हो जानेपर कोई खद्योतमात्र—खद्योतके बराबर परिमाणवाला अंगारा रह जायगा तो उस अंगारेके द्वारा उससे—उसके परिमाणसे थोड़ा-सा भी अधिक दाह नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी अन्नसे उपचित हुई सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला—एक भाग रह गयी है। उस खद्योतमात्र अंगारके समान एक कलासे तू इस समय वेदोंका अनुभव नहीं कर सकता—इस समय तुझे उनका ज्ञान |