छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
६१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
यद्विद्युतो रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
आदित्यका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्णरूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्य से आदित्यत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ २ ॥ चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमारूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ ३ ॥ विद्युतका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो गयी, क्योंकि [ विद्युत्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ ४ ॥
| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| यदादित्यस्य यच्चन्द्रमसो यद्विद्युत इत्यादि समानम् । | जो आदित्यका, जो चन्द्रमाका, जो विद्युत्का इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। |
| ननु यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीत्युक्त्वा तेजस एव चतुर्भिरप्युदाहरणैरग्न्यादिभिस्त्रिवृत्करणं दर्शितं नावन्नयोरुदाहरणं दर्शितं त्रिवृत्करणे । | शङ्का—किंतु 'हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान' ऐसा कहकर अग्नि आदि चारों उदाहरणोंसे तेजका ही त्रिवृत्करण दिखलाया गया है, त्रिवृत्करणमें जल और अन्नका तो उदाहरण प्रदर्शित किया ही नहीं गया। |
| खण्ड ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ६१७ |
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| संस्कृत (मूल भाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| नैष दोषः; अबन्नविषयान्यप्युदाहरणान्येवमेव च द्रष्टव्यानीति मन्यते श्रुतिः, तेजस उदाहरणमुपलक्षणार्थम्। रूपवत्त्वात्स्पष्टार्थत्वोपपत्तेश्च। गन्धरसयोरनुदाहरणं त्रयाणामसंभवात्; न हि गन्धरसौ तेजसि स्तः। स्पर्शशब्दयोरनुदाहरणं विभागेन दर्शयितुमशक्यत्वात्। | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है। श्रुति ऐसा मानती है कि जल और अन्नविषयक उदाहरणोंको भी इसी प्रकार जानना चाहिये। तेजका उदाहरण उनका उपलक्षण करानेके लिये है। इसके सिवा, रूपवान् होनेके कारण उसके द्वारा स्पष्टार्थता भी सम्भव है। गन्ध और रसका उदाहरण इसलिये नहीं दिया गया कि इन तीनोंमें उनका होना असम्भव है; तेजमें गन्ध और रस हैं ही नहीं। तथा [त्रिविध] स्पर्श और [त्रिविध] शब्दको अलग करके नहीं दिखाया जा सकता इसलिये उनका भी उदाहरण नहीं दिया। |
| यदि सर्वं जगत्त्रिवृत्कृतमित्यग्न्यादिवत्त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यमग्नेरग्नित्ववदपागाज्जगतो जगत्त्वम्। तथाऽन्नस्याप्यप्शुङ्गत्वादाप इत्येव सत्यं वाचारम्भणमात्रमन्नम्। तथापामपि तेजःशुङ्गत्वाद्वाचारम्भणत्वं तेज इत्येव सत्यम्। तेजसोऽपि सच्छुङ्गत्वाद्वाचारम्भणत्वं सदित्येव सत्यमित्येषोऽर्थ विवक्षितः। | यदि सारा ही जगत् त्रिवृत्कृत है और अग्नि आदिके समान केवल तीन ही रूप सत्य हैं तो अग्निके अग्नित्वके समान संसारका संसारत्व भी निवृत्त हो गया। तथा अन्न जलका कार्य है, इसलिये जल ही सत्य है, अन्न केवल वाचारम्भणमात्र है; तथा तेजका कार्य होनेके कारण जल भी वाचारम्भणमात्र ही है, तेज ही सत्य है और तेज भी सत्का कार्य है इसलिये वह भी वाचारम्भण ही है, केवल सत् ही सत्य है। इस प्रकार इससे यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है। |