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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

४२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी नहीं जानते इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली गयी है ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ पुनर्यै चास्य विदुषो जन्तोर्जीवा जीवन्तीह पुत्रा भ्रात्रादयो वा ये च प्रेता मृता इष्टाः सम्बन्धिनो यच्चान्यदिह लोके वस्त्रान्नपानादि रत्नादि वा वस्त्विच्छन्न लभते तत्सर्वमत्र हृदयाकाशाख्ये ब्रह्मणि गत्वा यथोक्तेन विधिना विन्दते लभते । अत्रास्मिन्हार्दाकाशे हि यस्मादस्यैते यथोक्ताः सत्याः कामा वर्तन्तेऽनृतापिधानाः ।<br><br>कथमिव तदन्याय्यमित्युच्यते । तत्तत्र यथा हिरण्यनिधिं हिरण्यमेव पुनर्ग्रहणाय निधातृभिर्निधीयत इति निधिस्तं हिरण्यनिधिं निहितं भूमेरधस्तान्निक्षिप्तमक्षेत्रज्ञा निधिशास्त्रैर्निधिक्षेत्र-तथा इस विद्वान् प्राणीको जो जीव—इस लोकमें जीवित पुत्र या भ्राता आदि, अथवा जो प्रेत—मरे हुए इष्टसम्बन्धी तथा इस लोकमें जो वस्त्र एवं अन्न-पानादि और रत्नादि पदार्थ इच्छा करनेपर भी नहीं मिलते उन सबको यह इस हृदयाकाशरूप ब्रह्ममें पहुँचकर उपर्युक्त विधिसे प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ उसके इस हृदयाकाशमें ये उपर्युक्त सत्य काम मिथ्यासे आच्छादित हुए वर्तमान रहते हैं ।<br><br>[अपने आत्मभूत ब्रह्ममें विद्यमान रहनेपर भी कामनाएँ यहाँ उपलब्ध नहीं होतीं ] यह असङ्गत बात कैसे हो सकती है ? यह बतलाया जाता है । इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार हिरण्यनिधि—हिरण्य (सुवर्ण) ही, धरोहर रखनेवाले पुरुषोंद्वारा पुनः ग्रहण करनेके लिये धरोहररूपसे निहित किया (रख दिया) जाता है, इसलिये निधि है । भूमिके नीचे

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९


| मजानन्तस्ते निधेरुपर्य्युपरि सञ्चरन्तोऽपि निधिं न विन्देयुः शक्यवेदनमपि; एवमेवेमा अविद्यावत्यः सर्वा इमाः प्रजा यथोक्तं हृदयाकाशाख्यं ब्रह्मलोकं ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोकस्तमहरहः प्रत्यहं गच्छन्त्योऽपि सुषुप्तकाले न विन्दन्ति न लभन्ते एषोऽहं ब्रह्मलोकभावमापन्नोऽस्मीतीति । अनृतेन हि यथोक्तेन हि यस्मात्प्रत्यूढा हृताः स्वरूपादविद्यादिदोषैर्बहिरपकृष्टा इत्यर्थः । अतः कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां यत्स्वायत्तमपि ब्रह्म न लभ्यत इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | निहित—निक्षिप्त ( रखी हुई ) उस सुवर्णनिधिको जिस प्रकार उस स्थानसे अनभिज्ञ—निधिशास्त्रद्वारा निधिक्षेत्रको न जाननेवाले पुरुष निधि के ऊपर सञ्चार करते हुए भी, जिसका ज्ञान प्राप्त होना सम्भव भी है उस निधिको भी नहीं जानते उसी प्रकार यह सम्पूर्ण अविद्यावती प्रजा उपर्युक्त हृदयाकाशसंज्ञक लोकको—ब्रह्म यही लोक है उस ब्रह्मलोकको सुषुप्तिकालमें प्रतिदिन जानेपर भी 'यह मैं इस समय ब्रह्मलोकभावको प्राप्त हो गया हूँ' इस प्रकार नहीं उपलब्ध करतीं, क्योंकि वह उपर्युक्त अनृतसे प्रत्यूढ—हृत है अर्थात् अविद्यादिदोषोंद्वारा—अपने स्वरूपसे बाहर खींच ली गयी है । अतः यह बड़े कष्टकी बात है कि स्वायत्त होनेपर भी जीवोंको ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२॥ |


स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तꣳहृद्यमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥३॥

वह यह आत्मा हृदयमें है 'हृदि अयम्' ( यह हृदयमें है ) यही इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है । इसीसे यह 'हृदय' है । इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोकको जाता है ॥ ३ ॥