छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| देत्युद्गच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। हं वा इत्यवधारणार्थौ निपातौ उदेत्येवेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | पापोंसे ऊपर उठ जाता है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं—अर्थात् ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ |
—: ० :—
| तस्योद्गीथत्वं देवस्यादित्या-<br>दीनामिव विवक्षितत्वादाह— | आदित्यादिके समान उस [ उद्-<br>संज्ञक ] देवका उद्गीथत्व कहना<br>इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती है— |
तस्यर्क् साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वे-<br>वोद्गातैतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो<br>लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥
उस देवके ऋक् और साम—ये दोनों पक्ष हैं। इसीसे वह देव उद्गीथरूप है, और इसीसे [ इसका गान करनेवाला ] उद्गाता कहलाता है, क्योंकि वह इस (उत्) का ही गान करनेवाला होता है। वह यह उत् नामक देव जो इस ( आदित्यलोक ) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं, उनका शासन करता है। यह अधिदैवत उद्गीथोपासना है ॥ ८ ॥
| तस्यर्क् साम च गेष्णौ<br><br>पृथिव्याद्युक्तलक्षणे पर्वणी ।<br><br>सर्वात्मा हि देवः। परापरलोक<br><br>कामेशितृत्वादुपपद्यते पृथिव्य-<br><br>ग्न्यादृक्सामगेष्णत्वम्, सर्वयो-<br><br>नित्वाच्च । | उस देवके ऋक् और साम गेष्ण हैं अर्थात् पूर्वोक्त पृथिवी और अग्नि आदि उसके दोनों पक्ष हैं, क्योंकि वह देव सर्वरूप है। वह परलोक और इहलोकसम्बन्धी कामनाओंका शासन करनेवाला है; अतः उसका पृथिवी और अग्नि आदिरूप ऋक् और साममय पंखोंसे युक्त होना उचित ही है। तथा सबका कारण होनेसे भी [ उसका ऋक्-सामरूप पक्षोंवाला होना उचित है ] । |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत एवमुन्नामा चासावृक्सामगेष्णश्च तस्मादृक्सामगेष्णत्वप्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षेण परोक्षप्रियत्वाद्देवस्य, तस्मादुद्गीथ इति। तस्मात्त्वेव हेतोरुदं गायतीत्युद्गाता। तस्माद्ध्येतस्य यथोक्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तोद्गातेति.नामप्रसिद्धिरुद्गातुः। | इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' नामवाला है तथा ऋक् और साम उसके पक्ष हैं, इसलिये ऋक्-साम-रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त उद्गीथत्वका परोक्षरूपसे प्रतिपादन हो जाता है; क्योंकि वह देव परोक्ष प्रिय* है। इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा कहा। इसी हेतुसे, क्योंकि [यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता कहलाता है। इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देवका गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना उचित ही है। |
| स एष देव उन्नामा ये चामुष्मादादित्यात्पराञ्चः परागञ्चनादूर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां चेष्टे न केवलमीशितृत्वमेव चशब्दाद्धारयति च, “स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्” (यजु० २५। १०) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। किं च देवकामानामीष्ट इत्येतदधिदैवतं देवताविषयं देवस्योद्गीथस्य स्वरूपमुक्तम् ॥ ८ ॥ | वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो पराङ् यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकोंका ईश्वर (शासक) है। वह केवल शासनकर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह भी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस पृथ्वीको और द्युलोक-को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। यही नहीं, वह देवताओंकी कामनाओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका--उद्गीथका अधिदैवत--देवताविषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
* देवताओंकी परोक्षप्रियता 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः' इस श्रुतिसे प्रमाणित होती है।
सप्तम खण्ड
— : ० : —
अध्यात्म-उद्गीथोपासना
अथाध्यात्मं वागेवर्क्प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥
इससे आगे अध्यात्म उपासना है—वाणी ही ऋक् है और प्राण साम है। इस प्रकार इस [वाक्रूप] ऋक्में [प्राणरूप] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है। इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ १ ॥
| अथाधुनाध्यात्ममुच्यते—वागेवर्क्प्राणः साम, अधरोपरिस्थानत्वसामान्यात् । प्राणो घ्राणमुच्यते सह वायुना। वागेव सा प्राणोऽम इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | आधिदैविक उपासनाके पश्चात् अब अध्यात्म उपासनाका वर्णन किया जाता है—नीचे-ऊपर स्थान होनेमें तुल्य होनेके कारण वाक् ही ऋक् है और प्राण साम है। वायुके सहित घ्राणेन्द्रिय ही यहाँ प्राण कहा गया है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है इत्यादि कथन पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । चक्षुरेव सात्मामस्तत्साम ॥ २ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है । इस प्रकार इस [चक्षुरूप] ऋक्में यह [आत्मारूप] साम अधिष्ठित है । इसलिये ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है । चक्षु ही 'सा' है और आत्मा 'अम' है । इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ २ ॥
| चक्षुरेव ऋक्, आत्मा साम, आत्मेतिच्छायात्मा तत्स्थत्वात्साम ॥ २ ॥ | चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है। यहाँ 'आत्मा' शब्दसे छायात्माका ग्रहण है; क्योंकि वही नेत्रमें स्थित होनेके कारण साम है ॥ २ ॥ |
श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है । इस प्रकार इस [श्रोत्ररूप] ऋक्में यह [ मनरूप ] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'अम' है । इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम, श्रोत्रस्याधिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्॥३॥ | श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है, श्रोत्रका अधिष्ठाता होनेके कारण मनकी सामरूपता है ॥ ३ ॥ |
अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। अथ यदेवैतदक्षणः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥
छा० उ० ४—