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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]


आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्र-
मत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः
स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥

अन्तमें अपने स्वरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन करते हुए अप्रमत्त होकर स्तुति करे। जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर वह स्तुति करता है वही फल तत्काल समृद्धिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥

| आत्मानमुद्गाता स्वं रूपं गोत्रनामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं चात्मानमन्ततोऽन्त उपसृत्य स्तुवीत। कामं ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादमकुर्वन्। ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह यद्यत्रास्मा एवंविदे स कामः समृद्ध्येत समृद्धिं गच्छेत्। कोऽसौ ? यत्कामो यः कामोऽस्य सोऽयं यत्कामः सन् स्तुवीतेति द्विरुक्तिरादरार्था ॥ १२ ॥ | उद्गाताको चाहिये कि गोत्र और नामादिके सहित अपना—अपने स्वरूपका चिन्तन करता हुआ अर्थात् सामादि क्रमसे अन्तमें अपना स्मरण करता हुआ स्तुति करे। [किस प्रकार स्तुति करे ?] फलका चिन्तन करता हुआ अप्रमत्त होकर अर्थात् स्वर, ऊष्म एवं व्यञ्जनादि वर्णोच्चारणमें प्रमाद न करता हुआ [स्तुति करे]। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासककी जो कामना होती है वह शीघ्र ही समृद्ध (फलवती) हो जाती है। वह कामना कौन-सी है ? वह उपासक यत्काम अर्थात् जिस कामनावाला होकर स्तुति करता है। [श्रुतिमें] 'यत्कामः स्तुवीत' इन पदोंका दो बार प्रयोग आदरके लिये है ॥ १२ ॥ |

—: ॐ :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

उद्गीथसंज्ञक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥

‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। ‘ॐ’ ऐसा [ उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता ] उद्गान करता है। उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥

| ओमित्येतदित्यादिप्रकृतस्याक्षरस्य पुनरुपादानमुद्गीथाक्षराद्युपासनान्तरितत्वादन्यत्र प्रसङ्गो मा भूदित्येवमर्थम्। प्रकृतस्यैवाक्षरस्यामृताभयगुणविशिष्टस्योपासनं विधातव्यमित्यारम्भः।<br><br>ओमित्यादिव्याख्यातम् ॥१॥ | पूर्व-प्रस्तावित ओंकार अक्षरका ही ‘ओमित्येतत्’ इत्यादि वाक्यद्वारा इसलिये ग्रहण किया गया है जिससे बीचमें ‘उद्गीथ’ शब्दके अक्षरोंकी उपासनासे व्यवहित हो जानेके कारण अन्यत्र प्रसङ्ग न हो जाय। उस पूर्वप्रस्तावित अक्षरके ही अमृत और अभय गुणविशिष्ट स्वरूपकी उपासनाका विधान करना है—इसीके लिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है। ओमित्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥१॥ |

—: ० :—