छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| पृथिव्यन्नयोरिव भोज्यत्वलक्षणयोः संबन्धो न गार्हपत्यादित्ययोः । अत्तृत्वपक्तृत्वप्रकाशनधर्मा अविशिष्टा इत्यत एकत्वमेवानयोरत्यन्तम् । पृथिव्यन्नयोस्तु भोज्यत्वेनाभ्यां संबन्धः ॥ १ ॥ | भोज्यत्व ही जिनका लक्षण है उन पृथिवी और अन्नके समान गार्हपत्याग्नि और आदित्यका सम्बन्ध नहीं है । इन दोनोंमें भोक्तृत्व, पाचकत्व और प्रकाशकत्व ये धर्म समानरूपसे हैं; अतः इन दोनोंका अत्यन्त अभेद है । पृथिवी और अन्नका तो इनसे भोज्यरूपसे सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |
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स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको नष्ट कर देता है, अग्निलोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती (संतानपरम्परामें उत्पन्न ) पुरुष क्षीण नहीं होते । तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है [ उसको पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है ] ॥ २ ॥
| स यः कश्चिदेवं यथोक्तं गार्हपत्यमग्निमन्नान्नादत्वेन चतुर्धा प्रविभक्तमुपास्ते सोऽपहते विनाशयति पापकृत्यां पापं | वह पुरुष, जो कोई कि इस प्रकार भोग्य और भोक्तारूपसे चार प्रकारोंमें विभक्त हुए पूर्वोक्त गार्हपत्याग्निकी उपासना करता है वह पापकर्मोंका नाश कर देता है, तथा |
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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४११
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| कर्म। लोकी लोकवांश्चास्मदीयेन लोकेनाग्नेयेन तद्वान्भवति यथा वयम्। इह च लोके सर्वं वर्षशतमायुरेति प्राप्नोति। ज्योगुज्ज्वलं जीवति नाप्रख्यातः इत्येतत्। न चास्यावराश्च ते पुरुषाश्चास्य विदुषः सन्ततिजा इत्यर्थः। न क्षीयन्ते सन्तत्युच्छेदो न भवतीत्यर्थः। किं च तं वयमुपभुञ्ज्मः पालयामोऽस्मिंश्च लोके जीवन्तममुष्मिंश्च परलोके। य एतमेवं विद्वानुपास्ते यथोक्तं तस्यैतत्फलमित्यर्थः ॥ २ ॥ | हमारे आग्नेय लोकके द्वारा उसी प्रकार लोकी—लोकवान् होता है जैसे कि हम हैं। इस लोकमें भी वह सम्पूर्ण—सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है; ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है अर्थात् अप्रसिद्ध होकर नहीं जीता तथा इसके अवर पुरुष जो अवर—पश्चाद्वर्ती यानी संततिमें उत्पन्न हुए पुरुष हैं वे क्षीण नहीं होते अर्थात् इसकी संततिका उच्छेद नहीं होता। यही नहीं, इस लोकमें जीवित रहते हुए तथा परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विद्वान् इस प्रकार इसकी उपासना करता है उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
द्वादश खण्ड
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अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या
अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति । य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
फिर उसे अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा [ ये मेरे चार शरीर हैं ]। चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष (वंशज) क्षीण नहीं होते तथा इस लोक और परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं, जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है ॥ २ ॥
| अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशास दक्षिणाग्निरापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इत्येता मम चतस्रस्तनवश्चतुर्धाहमन्वाहार्यप- | फिर उसे अन्वाहार्यपचन—दक्षिणाग्निने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा—ये मेरे चार शरीर हैं। मैं अपनेको चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा- |
| खण्ड १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४१३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| चन आत्मानं प्रविभज्यावस्थितः । तत्र य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति पूर्ववत् ।<br><br>अन्नसंबन्धाज्ज्योतिष्ट्वसामान्याच्चान्वाहार्यपचनचन्द्रमसोरेकत्वं दक्षिणदिक्संबन्धाच्च । अपां नक्षत्राणां च पूर्ववदन्नत्वेनैव संबन्धः । नक्षत्राणां चन्द्रमसो भोग्यत्वप्रसिद्धेः । अपामन्नोत्पादकत्वादन्नत्वं दक्षिणाग्नेः पृथिवीवद्गार्हपत्यस्य । समानमन्यत् ॥ १-२ ॥ | हार्यपचनरूपसे स्थित हूँ। उनमेंसे चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ—' ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये ।<br><br>अन्नसे ¹ सम्बन्ध होनेके कारण, ज्योतिष्ट्वमें समानता होनेसे तथा दक्षिण ² दिशासे सम्बन्ध होनेके कारण अन्वाहार्यपचन और चन्द्रमाकी एकता है । जल और नक्षत्रोंका तो पूर्ववत् अन्नरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि नक्षत्र चन्द्रमाके भोग्य हैं, यह प्रसिद्ध है तथा अन्नके उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण जलोंका भी इसी प्रकार दक्षिणाग्निका अन्नत्व प्राप्त है जैसे पृथिवीको गार्हपत्याग्निका । शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
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</div>१. दर्श-पूर्णमास यज्ञमें अन्वाहार्यपचन अग्निमें हविष्य पकाया जाता है; तथा चन्द्रमाके विषयमें 'चन्द्रमाको प्राप्त होकर अन्न हो जाता है' ऐसा श्रुति-वाक्य है । इसलिये इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है ।
२. अन्वाहार्यपचनको दक्षिणाग्नि भी कहते हैं; तथा चन्द्रमाको भी दक्षिण मार्गसे जानेवाले ही प्राप्त होते हैं । इसलिये इन दोनोंका दक्षिण दिशासे सम्बन्ध है ।
त्रयोदश खण्ड
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आहवनीयाग्निविद्या
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति । एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—‘प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायो देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ’ ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस ( चतुर्धा विभक्त अग्नि ) की उपासना करता है, पापकर्मको नष्ट कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष ( वंशज ) क्षीण नहीं होते तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इसे इस प्रकार जानकर इसको उपासना करता है ॥ २ ॥
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५
| अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास <br><br> प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति <br><br> ममाप्येताश्चतस्रस्तनवः । य एष <br><br> विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहम-<br><br>स्मीत्यादि पूर्ववत्सामान्यात् । <br><br> दिवाकाशयोस्त्वाश्रयत्वाद्बिद्युदा-<br><br>हवनीययोर्भोग्यत्वेनैव संबन्धः । <br><br> समानमन्यत् ॥ १-२ ॥ | तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—'प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत्—ये मेरे भी चार शरीर हैं। यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ' इत्यादि अर्थ पहलेहीके समान होनेके कारण पूर्ववत् है। द्युलोक और आकाशके साथ विद्युत् और आहवनीयका भोग्यरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि ये क्रमशः इनके आश्रय हैं। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
चतुर्दश खण्ड
आचार्यका आगमन
ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥
उन्होंने कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या तेरे प्रति कही। आचार्य तुझे [इनके फलकी प्राप्तिका] मार्ग बतलावेंगे।' तदनन्तर उसके आचार्य आये। उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥
| ते पुनः संभूयोचुर्होपकोसलैषा सोम्य ते तवास्मद्विद्याग्निविद्येत्यर्थः । आत्मविद्या पूर्वोक्ता प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति च । आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता विद्याफलप्राप्तय इत्युक्त्वोपेरेमुरग्नयः । आजगाम हास्याचार्यः कालेन । तं च शिष्यमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥१॥ | तब उन्होंने पुनः एक साथ कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह हमने तेरे प्रति अपनी विद्या अर्थात् अग्निविद्या और आत्मविद्या—जो पहले 'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इत्यादि रूपसे कही गयी है कह दी। अब इस विद्याके फलकी प्राप्तिके लिये आचार्य तुझे मार्ग बतलावेंगे।' ऐसा कहकर अग्निगण उपरत हो गये। कालान्तरमें उसके आचार्य आये तब आचार्यने उस अपने शिष्यसे कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥ |
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्य ४१७
आचार्य और उपकोशलका संवाद
भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद् इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशां अन्यादृशा इतोहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किलऽते वोचन्निति ॥ २ ॥
उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। [ आचार्य बोले— ] 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?' 'अजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो उसे छिपाने लगा। [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला— ] 'निश्चय इन्होंने [ उपदेश किया है ] जो अन्य प्रकारके थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोंको बतलाया। [ तब आचार्यने पूछा— ] 'हे सोम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' ॥ २ ॥
इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥
तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर दिया। [ इसपर आचार्यने कहा— ] 'हे सोम्य ! उन्होंने तो तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है; अब मैं तुझे वह बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पापकर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह बोला—'भगवान् मुझे बतलावें।' तब आचार्य उससे बोले ॥ ३ ॥