छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| स वै यः 'आत्मापहतपाप्मा' इति प्रकृतो वैशब्देन तं स्मारयति, एष विवक्षित आत्मा हृदि हृदयपुण्डरीक आकाशशब्देनाभिहितः । तस्यैतस्य हृदयस्यैतदेव निरुक्तं निर्वचनं नान्यत् । हृद्ययमात्मा वर्तत इति यस्मात्तस्माद्धृदयम् । हृदयनामनिर्वचनप्रसिद्ध्यापि स्वहृदय आत्मेत्यवगन्तव्यमित्यभिप्रायः । अहरहर्वे प्रत्यहमेवंविद्धृद्ययमात्मेति जानन् स्वर्गं लोकं हार्दं ब्रह्मैति प्रतिपद्यते । | वह जो आत्मा है, 'आत्मापहतपाप्मा' इस प्रकार जिसका प्रकरण है उस आत्माका ही श्रुति 'वै' शब्दसे स्मरण कराती है । यह विवक्षित आत्मा हृदय-पुण्डरीकमें 'आकाश' शब्दसे कहा गया है । उस इस हृदयका यही निरुक्त-निर्वचन (व्युत्पत्ति) है, अन्य नहीं । क्योंकि यह आत्मा हृदयमें विद्यमान है इसलिये यह हृदय है । इस प्रकार 'हृदय' इस नामके निर्वचनकी प्रसिद्धिसे भी 'आत्मा अपने हृदयमें है' ऐसा जानना चाहिये—ऐसा इसका अभिप्राय है । अहरहः—प्रतिदिन इस प्रकार जाननेवाला अर्थात् 'यह आत्मा हृदयमें है' इस प्रकार जाननेवाला पुरुष स्वर्गलोक—हृदयस्थ ब्रह्मको प्राप्त होता है । |
| नन्वनेवंविदपि सुषुप्तकाले हार्दं ब्रह्म प्रतिपद्यत एव सुषुप्तकाले सता सोम्य तदा सम्पन्न इत्युक्तत्वात् । | **शङ्का—**किंतु इस प्रकार न जाननेवाला भी सुषुप्तकालमें ब्रह्मको प्राप्त होता ही है, क्योंकि सुषुप्तकालमें 'हे सोम्य ! उस समय यह सत्से सम्पन्न हो जाता है' ऐसा कहा गया है । |
| बाढमेवं तथाप्यस्ति विशेषः । | **समाधान—**ठीक है, ऐसा ही है । तो भी कुछ विशेषता है । |
| यथा जानन्नजानंश्च सर्वो जन्तुः | जिस प्रकार विद्वान् और अविद्वान् |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३१
| सद्ब्रह्मैव तथापि तत्त्वमसीति प्रतिबोधितो विद्वान्सद्देव नान्योऽस्मीति जानन्सद्देव भवति । एवमेव विद्वानविद्वांश्च सुषुप्ते यद्यपि तत्सम्पद्यते तथाप्येवंविदेव स्वर्गं लोकमेतीत्युच्यते । देहपातेऽपि विद्याफलस्यावश्यंभावित्वादित्येष विशेषः ॥ ३ ॥ | सभी जीव सद्ब्रह्म ही हैं, तथापि 'तू वह है' इस प्रकार घोषित किया हुआ विद्वान् 'मैं सत् ही हूँ, और कुछ नहीं' इस प्रकार जानता हुआ सत् ही हो जाता है। इसी प्रकार यद्यपि सुषुप्तमें विद्वान् और अविद्वान् दोनों ही सत्को प्राप्त होते हैं, तो भी केवल इस प्रकार जाननेवाला ही स्वर्गलोकको प्राप्त होता है—ऐसा कहा जाता है, क्योंकि देहपात होनेपर भी विद्याका फल अवश्यम्भावी है। यही इसकी विशेषता है ॥ ३ ॥ |
अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥ ४ ॥
यह जो सम्प्रसाद है वह इस शरीरसे उत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥
| सुषुप्तकाले स्वेनात्मना सता | सुषुप्तकालमें अपने आत्मा सत्से सम्पन्न हुआ पुरुष सम्यक् रूपसे प्रसन्न होता है, अतः वह जाग्रत् तथा स्वप्नके विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे प्राप्त हुई |
| सम्पन्नः सन्सम्पक् प्रसीदतीति | |
| जाग्रत्स्वप्नयोर्विषयेन्द्रियसंयोग- |