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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

भाष्यम्अनुवाद
चित्रगुवत्। न स्वतो नेति नेतीत्युक्तत्वात्। यथोक्तलक्षण एवात्मा विज्ञेयो गुरुभ्यः शास्त्रतश्चात्मसंवेद्यतया च स्वाराज्यकामैः।संकल्प और कामना चित्रगुके समान* उसकी शुद्धसत्त्वरूप उपाधिके कारण हैं, स्वतः नहीं; क्योंकि 'नेति नेति' ऐसा कहकर उनका प्रतिषेध किया गया है। स्वाराज्यकी इच्छावाले पुरुषोंको गुरु और शास्त्रद्वारा उपर्युक्त लक्षणोंवाले आत्माको ही स्वसंवेद्यरूपसे जानना चाहिये।
(आत्मतत्त्वाज्ञाने दोषः)<br>न चेद्विज्ञायते को दोषः स्यादिति, शृणु—तत्र दोषं दृष्टान्तेन। यथा हीवेह लोके प्रजा अन्वाविशन्त्यनुवर्तन्ते यथानुशासनं यथेह प्रजा अन्यं स्वामिनं मन्यमानाः स्वस्य स्वामिनो यथा यथानुशासनं तथा तथान्वाविशन्ति। किम् ? यं यमन्तं प्रत्यन्तं जनपदं क्षेत्रभागं वाभिकामा अर्थिन्यो भवन्त्यात्मबुद्ध्यनुरूपं तं तमेव च प्रत्यन्तादिमुपजीवन्तीति। एष दृष्टान्तोऽस्वातन्त्र्यदोषं प्रति पुण्यफलोपभोगे ॥ ५ ॥यदि कहो कि उसे न जानें तो भी क्या दोष है तो इसमें जो दोष है वह दृष्टान्तपूर्वक सुनो। इस लोकमें जिस प्रकार प्रजा [राजाके] अनुशासनके अनुसार रहती है—इस लोकमें जिस प्रकार अपनेसे भिन्न कोई अन्य स्वामी माननेवाली प्रजा जैसी अपने स्वामीकी आज्ञा होती है उसी प्रकार अनुवर्तन करती है; किसका अनुवर्तन करती है?—वह अपनी बुद्धिके अनुसार जिस-जिस प्रत्यन्त (वस्तुकी संनिधि), देश अथवा क्षेत्रभागकी कामना करती है उसी-उसी प्रत्यन्तादिकी उपजीविनी होती है। यह दृष्टान्त पुण्यफलोपभोगमें अस्वातन्त्र्यदोषके प्रति है ॥ ५ ॥

* जिस प्रकार जिसके यहाँ चित्र-वर्णवाली गौएँ हैं उसको चित्रगु कहते हैं, उसी प्रकार।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९


पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व

अथान्यो दृष्टान्तस्तत्क्षयं प्रति तद्यथेहेत्यादिः ।अब उस (कर्मफल) के क्षयके लिये 'तद्यथेत्यादि' श्रुतिसे दूसरा दृष्टान्त दिया जाता है—

तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान्कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥

जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता है उसी प्रकार परलोकमें पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है । जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओंको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति नहीं होती और जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओंको जानकर [ परलोकमें ] जाते हैं उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥ ६ ॥

तत्तत्र यथेह लोके तासामेव स्वाम्यनुशासनानुवर्तिनीनां प्रजानां सेवादिजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयतेऽन्तवान्भवति । अथेदानीं दार्ष्टान्तिकमुपसंहरति एवमेवामुत्राग्निहोत्रादिपुण्यजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयत एवेति । उक्तो दोषसो जिस प्रकार इस लोकमें अपने स्वामीके अनुशासनका अनुवर्तन करनेवाली उन प्रजाओंका सेवादि-कर्मसे प्राप्त किया हुआ यह लोक, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण-अन्तवान् हो जाता है—अब श्रुति दार्ष्टान्तका उपसंहार करती है—उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्रादि पुण्यकर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक भी, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण ही हो जाता है । उक्त दोष