छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तत्रैवं सति रूपत्रयव्यतिरेकेणाग्निरिति यन्मन्यसे त्वं तस्याग्नेरग्नित्वमिदानीमपागादपगतम्। प्राग्रूपत्रयविवेकविज्ञानाद्यग्निबुद्धिरासीत्ते साग्निबुद्धिरपगताग्निशब्दश्चेत्यर्थः। यथा दृश्यमानरक्तोपधानसंयुक्तः स्फटिको गृह्यमाणः पद्मरागोऽयमितिशब्दबुद्धयोः प्रयोजको भवति प्रागुपधानस्फटिकयोर्विवेकविज्ञानात्तद्विवेकविज्ञाने तु पद्मरागशब्दबुद्धी निवर्तेते तद्विवेकविज्ञातुस्तद्वत्। | ऐसा होनेपर, तू जो समझता था कि अग्नि इन तीनों रूपोंसे अलग भी कोई वस्तु है सो उस अग्निका अग्नित्व अब चला गया। तात्पर्य यह है कि इन तीनों रूपोंका विशेष ज्ञान होनेसे पूर्व तेरी जो अग्निबुद्धि थी वह अग्निबुद्धि और 'अग्नि' शब्द अब निवृत्त हो गये। जिस प्रकार दिखायी देते हुए लाल रंगके उपधान (समीपवर्ती पदार्थ) से मिला हुआ स्फटिक प्राप्त होनेपर उपधान और स्फटिकका पार्थक्य ज्ञात होनेसे पूर्व 'यह पद्मराग है' इस प्रकारके शब्द और बुद्धिका प्रयोजक होता है, किंतु उनका पार्थक्य ज्ञात होनेपर उसमें उस पार्थक्यज्ञानीके पद्मराग शब्द और पद्मराग-बुद्धि दोनों निवृत्त हो जाते हैं उसी प्रकार [ रूपत्रयका विवेक होनेपर अग्निका अग्नित्व निवृत्त हो जाता है ]। |
| ननु किमत्र बुद्धिशब्दकल्पनया क्रियते प्राग्रूपत्रयविवेककरणादग्निरेवासीत्तदग्नेरग्नित्वं | शङ्का—किंतु यहाँ (इस अग्निके सम्बन्धमें) अग्निबुद्धि और अग्निशब्द ऐसी अधिक कल्पना करके क्या लेना है? रूपत्रयका विवेक करनेसे पूर्व अग्नि ही था। वह |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१५
| रोहितादिरूपविवेककरणादपागादिति युक्तम्; यथा तन्त्वपकर्षणे पटाभावः । <br><br> नैवं बुद्धिशब्दमात्रमेव ह्यग्नियत आह वाचारम्भणमग्निर्नाम विकारो नामधेयं नाममात्रमित्यर्थः । अतोऽग्निबुद्धिरपि मृषैव किंतर्हि तत्र सत्यम् ! त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, नाणुमात्रमपि रूपत्रयव्यतिरेकेण सत्यमस्तीत्यवधारणार्थः ॥ १ ॥ | अग्निका अग्नित्व रोहितादि रूपोंका विवेक करनेसे निवृत्त हो गया—इतना ही कहना उचित है, जिस प्रकार कि तन्तुओंको निकाल लेनेपर पटका अभाव हो जाता है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अग्नि तो अग्निबुद्धि और अग्निशब्दमात्र ही है, कारण श्रुति कहती है 'अग्निरूप जो विकार है वह वाणीपर अवलम्बित नामधेय अर्थात् नाममात्र ही है।' इसलिये अग्निबुद्धि भी मिथ्या ही है । तो फिर उसमें सत्य क्या है ? बस, तीन रूप ही सत्य है—यह कथन इस बातको निश्चित करनेके लिये है कि तीन रूपोंके अतिरिक्त और कुछ अणुमात्र भी सत्य नहीं है ॥ १॥ |
| तथा— | इसी प्रकार— |
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यदादित्यस्य रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥२॥ यच्चन्द्रमसो रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥३॥