छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| वेत्थ पथोर्मार्गयोः सहप्रयाणयोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना व्यावर्तनमितरेतरवियोगस्थानं सह गच्छताम् ? इत्यर्थः । न भगव इति ॥२॥ | तुझे साथ-साथ जानेवाले देवयान और पितृयाण इन दोनों मार्गोंकी व्यावर्तना--व्यावर्तन अर्थात् इनपर साथ-साथ जानेवाले पुरुषोंके एक दूसरेसे अलग होनेके स्थानका पता है ? 'भगवन् ! नहीं ॥ २ ॥ |
वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति । वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति ? नैव भगव इति ॥ ३ ॥
[ प्रवाहण— ] 'तुझे मालूम है, यह पितृलोक भरता क्यों नहीं ?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं ।' [ प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप ( सोमघृतादि रस ) 'पुरुष' संज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं ?' [ श्वेतकेतु—] नहीं, 'भगवन् ! नहीं' ॥३॥
| वेत्थ यथासौ लोकः पितृसम्बन्धी–यं प्राप्य पुनरावर्तन्ते, बहुभिः प्रयद्भिरपि येन कारणेन न सम्पूर्यत इति ? न भगवत इति प्रत्याह । वेत्थ यथा येन क्रमेण पञ्चम्यां पञ्चसंख्याकायामाहुतौ हुतायामाहुतिनिर्वृत्ता आहुतिसाधनाश्चापः पुरुषवचसः पुरुष इत्येवं वचोऽभिधानं यासां हूय- | 'क्या तू जानता है कि यह पितृगणसम्बन्धी लोक, जिसे प्राप्त होकर फिर लौट आते हैं, बहुतोंके जानेपर भी किस कारणसे नहीं भरता ?' 'भगवन् ! नहीं' ऐसा उसने उत्तर दिया । 'क्या तुझे मालूम है कि किस प्रकार-किस क्रमसे पाँचवीं–पाँच संख्यावाली आहुतिके हुत होने पर आहुतिमें रहनेवाले आहुतिके साधनभूत आप पुरुषवाची हो जाते हैं ? तात्पर्य यह है कि हवन किये जानेवाले |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७५
| मानानां क्रमेण षष्ठाहुतिभूतानां ताः पुरुषवचसः पुरुषशब्दवाच्या भवन्ति पुरुषाख्यां लभन्ते ? इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव इत्याह, नैवाहमत्र किञ्चन जानामीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | जिन छठी आहुतिभूत द्रव्योंका 'पुरुष' यही वचन यानी नाम है वे पुरुषवाची कैसे हो जाते हैं ? अर्थात् पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हैं ?' ऐसा कहे जानेपर उसने यही कहा— 'भगवन् ! नहीं; अर्थात् मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता' ॥ ३ ॥ |
- : ॐ : -
प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना
अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथंसोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति। स हायस्तः पितुरर्धमेय्याय तँहोवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥
'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों बोलता था ? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है ?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥
| अथैवमज्ञः सन्किमनु कस्मात्त्वमनुशिष्टोऽस्मीत्यवोचथा उक्तवानसि ? यो हीमानि मया पृष्टान्यर्थजातानि न विद्यान्न विजानीयात्कथं स विद्वत्स्वनुशिष्टोऽस्मीति ब्रुवीत ? इत्येवं स श्वेतकेतुं राज्ञायस्त आयासितः | 'तो फिर इस प्रकार अज्ञ होनेपर भी तूने 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कहा ? जो पुरुष इन मेरी पूछी हुई बातोंको नहीं जानता वह विद्वानोंमें 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कह सकता है ? इस प्रकार राजासे आयस्त—पीडित हो वह श्वेतकेतु अपने |