सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
बौद्धाः। न तु सत्प्रतिद्वन्द्वि वस्त्वन्तरमिच्छन्ति; यथा सच्चासदिति गृह्यमाणं यथाभूतं तद्विपरीतं तत्त्वं भवतीति नैयायिकाः।ही तत्त्व मानते हैं। वे सत्की विरोधिनी कोई अन्य वस्तु नहीं मानते; जैसा कि नैयायिकोंका मत है कि गृहीत होनेवाली यथाभूत वस्तु और उससे विपरीत तत्त्व ये क्रमशः 'सत्' और 'असत्' हैं।
वैनाशिकमतसमीक्षणम्<br>ननु सदभावमात्रं प्रागुत्पत्तेश्चेदभिप्रेतं वैनाशिकैः, कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदसदेकमेवाद्वितीयं चेति कालसंबन्धः संख्यासंबन्धोऽद्वितीयत्वं चोच्यते तैः।शङ्का— यदि वैनाशिक उत्पत्तिसे पूर्व सत्‌का अभावमात्र ही मानते हैं तो 'उत्पत्तिसे पूर्व यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था' ऐसा कहकर वे उसका कालसम्बन्ध, संख्यासम्बन्ध और अद्वितीयत्व कैसे निरूपण करते हैं ?
बाढं न युक्तं तेषां भावाभावमात्रमभ्युपगच्छताम्। असत्त्वमात्राभ्युपगमोऽप्ययुक्त एव, अभ्युपगन्तुरनभ्युपगमानुपपत्तेः। इदानीमभ्युपगन्ताभ्युपगम्यते न प्रागुत्पत्तेरिति चेत् ? न; प्रागुत्पत्तेः सद्भावस्य प्रमाणाभावात्। प्रागुत्पत्तेरसदेवेति कल्पनानुपपत्तिः।समाधान— ठीक है, सत्‌की असत्तामात्र माननेवाले उन लोगोंका ऐसा कहना उचित नहीं है। इसके सिवा उनका असत्तामात्र मानना भी अनुचित ही है; क्योंकि जो [ऐसा] माननेवाला है उसका न मानना सम्भव नहीं है। यदि कहो कि इस समय तो माननेवाला माना ही जाता है उत्पत्तिसे पूर्व ही नहीं माना जाता, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इस प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व सत्‌के अभावको सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहता, और फिर 'उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था' ऐसी कल्पनाका होना सम्भव नहीं होता।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ननु कथं वस्त्वाकृतेः शब्दार्थ-<br>त्वेऽसदेकमेवाद्वितीयमितिपदार्थ-<br>वाक्यार्थोपपत्तिः, तदनुपपत्तौ<br>चेदं वाक्यमप्रमाणं प्रसज्येतेति<br>चेत् ?<br><br>नैष दोषः, सद्ग्रहणनिवृत्ति-<br>(मीमांसकोद्भावित-दोषनिराकरणम्) परत्वाद्वाक्यस्य ।<br>सदित्ययं तावच्छ-<br>ब्दः सदाकृतिवाचकः । एकमे-<br>वाद्वितीयमित्येतौ च सच्छब्देन<br>समानाधिकरणौ; तथेेदमासी-<br>दिति च । तत्र नञ् सद्वाक्ये प्रयुक्तः<br>सद्वाक्यमेवावलम्ब्य सद्वाक्यार्थ-<br>विषयां बुद्धिं सदेकमेवाद्वितीयमि-<br>दमासीदित्येवंलक्षणां ततः सद्वा-<br>क्यार्थान्निवर्तयत्यश्वारूढ इवाश्वा-<br>लम्बनोऽश्वं तदभिमुखविषयान्नि-<br>वर्तयति तद्वत् । न तु पुनः सद-मीमांसक— किंतु शब्दका अर्थ तो वस्तुकी आकृति ही होती है, ऐसी अवस्थामें एकमात्र अद्वितीय असत् ही था, इन पदोंका अथवा इस वाक्यका अर्थ कैसे ठीक हो सकता है ? और ठीक न हो सकनेपर तो यह [ श्रुतिका ] वाक्य ही अप्रामाणिक सिद्ध होगा ।<br><br>सिद्धान्ती— यहाँ यह दोष नहीं आता; क्योंकि यह वाक्य केवल सत्‌को ग्रहण करनेकी निवृत्ति करने मात्रमें ही तात्पर्य रखता है। 'सत्' यह शब्द तो सत्‌की आकृतिका वाचक है ही । 'एकमात्र अद्वितीय' ये दोनों शब्द 'सत्' शब्दके साथ समानाधिकरणरूपसे प्रयुक्त हैं । इसी प्रकार 'इदम्' और 'आसीत्' शब्द भी समानाधिकरण हैं । ऐसी अवस्थामें सद्-वाक्यमें प्रयोग किया हुआ 'नञ्¹' सद्-वाक्यको ही आलम्बन करके 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसी सद्-वाक्यार्थसम्बन्धिनी बुद्धिको, जिस प्रकार कि घोड़ेपर चढ़ा हुआ पुरुष घोड़ेका ही आश्रय लेकर उसे उसके अभिमुख विषयोंसे फेर देता है उसी प्रकार, सद्-वाक्यके अर्थसे निवृत्त कर देता है । वह

१. 'असत्' शब्दमें जो 'अ' है उसीको 'नञ्' कहा गया है ।