छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| न्ति, प्रसिद्धं ह्येतदुदयादौ सवितुः ॥ ३ ॥ | सूर्यके उदय आदि होनेके समय ये सब प्रसिद्ध ही हैं ॥ ३ ॥ |
स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनꣳसाधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥
वह जो इस प्रकार जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ] उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते हैं, सुख देते हैं ॥४॥
| स यः कश्चिदेतमेवं यथोक्तमहिमानं विद्वान्सन्नादित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते स तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः। किञ्च दृष्टं फलमभ्याशः क्षिप्रं तद्धिदः, यदिति क्रियाविशेषणम्, एनमेवंविदं साधवःशोभना घोषाः, साधुत्वं घोषादीनां यदुपभोगे पापानुबन्धाभावः। आ च गच्छेयुरागच्छेयुश्च, उप च | वह जो कोई इस आदित्यको ऐसी महिमावाला जानकर इसकी 'यह ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करता है' वह तद्रूप ही हो जाता है—ऐसा इसका भावार्थ है। तथा उसे यह दृष्टफल भी मिलता है—इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकके समीप अभ्याशः—शीघ्र ही साधु—सुन्दर घोष आकर प्राप्त होते हैं। मूलमें 'यत्' शब्द क्रियाविशेषण है। घोषादिकी साधुता यही है कि उनका उपभोग करनेपर पापानुबन्ध नहीं होता। वे घोष |
खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
| निम्रेडेरन्नुपनिम्रेडेरंश्च न केवल-<br>मागमनमात्रं घोषाणामुपसुखये-<br>युश्चोपसुखं च कुर्युस्त्यर्थः ।<br>द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थ<br>आदरार्थश्च ॥ ४ ॥ | आते हैं और उसे सुख देते हैं, उसे<br>सुख देते हैं । तात्पर्य यह है कि<br>घोषोंका केवल आगमन ही नहीं<br>होता वे उसे सुख भी देते हैं, सुख<br>भी देते हैं । 'निम्रेडेरन्निम्रेडेरन्' यह<br>द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करने<br>और आदरप्रदर्शनके लिये है ॥४॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय एकोन-<br>
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
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इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य<br>
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे<br>
तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥